Tuesday, December 22, 2009

जीजू संग सेक्स

हाय,
मेरा नाम हर्ष है, मैं इंदौर में रहता हूँ, गूगल पर सर्च करते करते मुझे अन्तर्वासना का पता चला ! सच्ची कहानियाँ पढ़कर बहुत अच्छा लगा। मैं भी अपना अनुभव अन्तर्वासना में भेजना चाहता था पर कैसे भेजा जाता है यह आता नहीं था। इसीलिए गुरूजी से सलाह ली।
अब मैं आपको अपनी आप बीती बताने जा रहा हूँ, बिल्कुल सच्ची कहानी है आप मानो या न मानो !
घटना आठ साल पुरानी है, जब मैं ग्वालियर में रहता था, मेरी दीदी की शादी पक्की हुई थी। तब हमारी मुलाकात उस व्यक्ति से हुई जो रिश्ते में मेरी दीदी के जेठ लगते हैं, धीरे धीरे हमारी जान पहचान उनसे बढ़ने लगी।
मेरी और मेरे जीजू की खूब पटती है। (मेरी दीदी के जेठ मेरे जीजू लगते हैं ) गर्मियों के दिन थे, मैं स्कूल से सीधा जीजू के घर गया। वे सो रहे थे तो मैं उन्हें परेशान करने लगा तो जीजू ने मुझे पकड़ कर लिटा लिया और मुझे कहने लगे- काश ! तू मेरी साली होती !
तो मैंने बात काटते हुए कहा- साली होता तो क्या करते ?
तो उन्होंने कहा- मौका मिलने दे, फिर बताऊंगा !
ऐसे ही दिन कटते गए। एक दिन की बात है, दीदी अपने गाँव गई थी। जीजू ने मुझे फ़ोन कर कहा- रात को घर पर खाना खायेंगे ! आ जाना !
रात करीब दस बजे मैं जीजू के घर गया, वे ड्यूटी से आ चुके थे। फ़िर हमने खाना खाया, खाना खाने के बाद जीजू नहाने चले गये, मुझे नींद आ रही थी तो मैं बिस्तर पर लेटा था इतने में जीजू नहा कर आ चुके थे उन्होंने सिर्फ़ पायजामा पहना हुआ था, वो भी पानी में गीला था तो उनके लंड का उभार साफ़ नज़र आ रहा था। मुझे अचानक कुछ होने लगा था जीजू ने फ़िर हाथ पैर में तेल लगाया और मेरे बगल में लेट गए।
वो मुझसे सेक्सी बातें कर रहे थे, मेरे लंड में अकड़न होने लगी थी। तभी जीजू ने मुझे अपनी तरफ़ खीच लिया और मेरे होठों पे अपने होंठ रख दिए और उन्हें चूसने लगे। मुझे अच्छा लग रहा था। थोड़ी देर बाद मैं भी उन्हें चूमने लगा तो उनकी हिम्मत बढ़ गई। उन्होंने अपना एक हाथ मेरी पैन्ट में डाल दिया। फ़िर मेरे लंड को आगे पीछे करने लगे, मुझे बहुत अच्छा लग रहा था !
करीब पन्द्रह मिनट तक हम ऐसा ही करते रहे। फ़िर जीजू ने अपना पायजामा उतार दिया और मुझसे मेरे कपड़े उतारने को कहने लगे। पर मैंने कहा- मुझे शरम आ रही है।
तो उन्होंने ख़ुद मेरे कपड़े उतारे। हम दोनों पूरे नंगे बेड पर लेटे थे। जीजू ने मुझे उनका लंड चूसने को कहा तो मैंने मना कर दिया क्योंकि मैंने कभी पहले ऐसा नही किया था। जीजू ने मुझे जोर न देते हुए मेरा लंड अपने मुँह में ले लिया।
मुझे पता नहीं क्या हो रहा था। जीजू मेरे पूरे शरीर में किस कर रहे थे। उन्होंने मेरी गांड के छेद में अपनी जीभ भी डाली। मैं सेक्स में डूबा जा रहा था। मेरे मुँह से अजीब सी आवाजें आ रही थी। अचानक जीजू उठे और कमरे की लाईट जला दी। मेरी नज़र जीजू के लंड पर पड़ी तो मेरी आँखे खुली रह गई क्योंकि उनका लंड करीब दस इंच लंबा और चार इंच मोटा था।
जीजू ने मुझे जोर दिया तो मैंने उनका लंड थोड़ा सा मुँह में लिया क्योंकि लंड मोटा होने की वजह से अन्दर नहीं जा रहा था। जीजू ने मुझे कुत्ते के पोज में किया और मेरी गांड के छेद को चाटने लगे। मैं अपने लंड को दबाने के सिवा कुछ नही कर पा रहा था।
फ़िर जीजू ने अपना लंड मेरी गांड के छेद पर रखा और कहा- थोड़ा दर्द होगा, डरना मत !
इतना कहते ही उन्होंने इतना जोर का धक्का मारा कि मेरे मुँह से बहुत जोर से चीख निकल गई। जीजू में जल्दी से मेरा मुँह दबाया और मेरे होंठों को अपने होंठों से जोड़कर चूसने लगे। मेरी गांड से खून बह रहा था तो उन्होंने मेरी गाण्ड से लण्ड निकाल लिया और मेरा लंड अपने मुँह में लिया और चूसने लगे। धीरे धीरे मेरा दर्द कम होने लगा और अचानक मेरे लंड से चिपचिपी धार निकली तो जीजू ने उसे पूरा पी लिया।
पूछने पर बताया- यही जब औरत की चूत में जाता है तो बच्चा होता है !
तो मैंने उनसे पूछा- टेस्ट कैसा है?
तो उन्होंने अपना लंड मेरे मुँह दिया और कहा- धीरे धीरे आगे पीछे कर ! अच्छा लगेगा !
करीब पाँच मिनट बाद उन्होंने मेरा सर जोर से अपने लंड पे दबाया और जोर की धार मेरे मुंह में मारी, नमकीन सा टेस्ट लगा पर पूरा मुँह उनके लंड के वीर्य से भर गया। जीजू ने कहा- पी जा ! अच्छा लगेगा !
तो मैं पूरा का पूरा पी गया। फ़िर हम रात को करीब तीन बजे नंगे ही सो गए।
आगे पढ़िये कि कैसे इंदौर में मुझे लंड लेने की आदत पड़ी, कैसे आर्मी के एक आदमी ने मुझे चोदा।
मेरी अगली कहानी की प्रतीक्षा कीजिए।
आपको मेरी कहानी कैसी लगी, मुझे मेल करना।

चतिनग से दोसति कर चुदै कि

हेल्लो दोसतोन, मेरा नाम होत बोय है और मैं देलहि मैं रेहता हून जैसे कि आप सब जनते।फ़िर भि नये दोसतोन के लिये मैन अपना परिचय दे देता हून, मेरा नाम रवि है, मैन देलहि का रनहे वला हून। मेरि उमर 37 साल है। अगर आपको मेरे बारे मे और जयदा जन ना है तो आप निचे लिखे मेरे मैल इद पे मुझे मैल कर सकते हैन। मा पिछलय सल अपनि चुत्तिओन का दोरन अपनय रिशतय दरो का घर देलहि घुमनय गया था। एक दिन भन पेर मैन सयबेर सफ़é से चत्तिनग कर रहा था। उस दिन 13 औग। था और छुत्ति थि। चत्तिनग पर मैन एक लदकि से गप-शप कर रहा था। उसने बतया कि वो देलहि से चत्तिनग कर रहि है तो मैने कहा मैन भि देलहि से चत्तिनग कर रहा हून। बात आगे बधि और सेक्स पर आ गयी। थोदि देर तक चत्तिनग करने के बाद वो मुझसे चुदवने के लिये रज़ि हो गयी। मैने उसका नाम पूछा तो उसने अपना नाम सुस्सि बतया।
उसने फिर मेरा नाम पूछा तो मैने भि अपना नाम बता दिया। उसने मुझसे सोनतसत करने के लिये कहा तो मैने पूछा तुम किस सयबेर सफ़é से चत्तिनग कर रहि हो तो उसने उस सयबेर सफ़é का नाम बतया। मैन चौनक गया कयोन कि मैन भि उसि सयबेर सफ़é से चत्तिनग कर रहा था। मैने उसे बतया तो वो भि चौनक पदि। उसने मेरा सबिन नुमबेर पूछा तो मैने उसे बता दिया। 2 मिनुते मेन हि एक गोरि चित्ति, एकहरे बदन कि बहुत हि खूबसुरत लदकि मेरे सबिन के बहर खदि थि। उसने सबिन के दूर से हि मुझे बुलया। मैन बहर आया और पूछा, “सुस्सि?” वो बोलि, “हान। आओ चलते हैन।” हुम दोनो बहर आये और एक तक्सि पकद लि। वो मुझे अपने घर बसनत विहर ले गयी। वो वहन पर एक दम अकेलि रहति थि। उसका पति एक सोमपनी मेन उक मेन कम करता था। वो 2 मोनथ मेन सिरफ़ 3-4 दिन के लिये हि देलहि आता था। उसका घर बहुत हि खूबसुरत था। वो मुझे सोफ़े पर बिथने को कहा और कपदे बदलने और चये बनने चलि गयी।
लगभग 10 मिनुते बीत चुके तो मैन बेचैन होने लगा। मैने तव ओन कर दिया और देखने लगा। 15 मिनुते के बाद वो चये लेकर आयी। उसने केवल बरा और पनती पहन रखि थि। उसका बदन एक दम गोरा था। वो बहुत हि खूबसुरत और सेक्सी लग रहि थि। उसने चये तबले पर रखि और मेरि गोद मेन बैथ कर चये बनने लगि। उसने मुझे चये दि और खुद मेरे गोद मेन हि बैथ कर चये पीने लगि। उसके गोद मेन बैथने से मैन जोश मेन आ गया और मेरा लुनद खदा हो गया। उसने भि मेरे खदे लुनद को महसूस किया और चये पीते हुये अपनि गानद को मेरे लुनद पर रगदने लगि। मुझे बहुत हि अच्चहा लग रहा था। 2 मिनुते मेन हि हुमने चये खतम कि और वो मेरे उपर से हत गयी। उसने मुझसे कहा, “मैने तो सारे कपदे निकल दिये लेकिन तुमने अभि तक अपने कपदे पहन रखे हैन। तुम भि उतर दो इन कपदोन को।” मैने भि अपनि चद्दहि छोदकर सारे कपदे उतर दिये। वो फिर से मेरि गोद मेन आकर बैथ गयी और मुझे चूमने लगि।
मैने भि उसके होथोन को चूमना शुरु कर दिया। उसके लिपस बहुत गरम थे। मैन उसके पीथ पर हाथ फिरने लगा और वो भि मेरे होथोन को चूमते हुये मेरे पीथ को सहलने लगि। मेरा लुनद एक दम उसकि चुत से सता हुअ था लेकिन बीच मेन उसकि पनती थि। मैने उसकि पनती नीचे करनि चहि तो वो बोलि, “पहले तुम अपनि चद्दहि उतरो उसके बाद मेरि पनती उतरना।” मैने अपनि चद्दहि उतरने के बाद उसकि पनती को भि उतर दिया। फिर मैने उसकि बरा को भि खोल कर फेनक दिया। अब हुम दोनो एक दम ननगे थे। मैने उसे बेद पर ले जा कर बिथा दिया। मैने उसके होथोन को चूमना और उसकि पीथ पर हाथ फिरना शुरु कर दिया। थोदि देर बाद मैने अपनि जीभ उसके मुह मेन दल दि और घुमने लगा। मेरे जीभ निकलने के बाद उसने भि वैसा हि किया। वो खूब मज़े से मेरे होथोन को चूस रहि थि और मेरे पीथ पर हाथ फिरा रहि थि। थोदि देर बाद मैने अपना हाथ उसकि चुत पर रख दिया तो वो मुझसे एक दम लिपत गयी। उसकि चुत एक दम साफ़ और चिकनि थि। मैने उसकि चुत पर हाथ फिरते फिरते अपनि एक उनगलि उसकि चुत मेन दल दि। उसकि चुत एक दम गीलि थि। थोदि देर बाद मैने अपनि पूरि उनगलि उसकि चुत मेन दल दि और अनदर बहर करने लगा। उसने भि मेरा 9′ का लुनद पकद लिया और सहलने लगि।
5 मिनुते मेन हि हुम दोनो एक दम जोश मेन आ गये। मैने उसे बेद पर लिता दिया और उसके पैरोन के बीच आ गया। मैने अपने लुनद का सुपदा उसकि चुत के बीच रखा तो उसने अपना चुतद उपर कि तरफ़ उथा दिया। मैने एक धक्का लगया तो मेरा आधा लुनद उसकि चुत मेन घुस गया। वो बोलि, “जलदि दलो अपना पूरा लुनद मेरि चुत मेन। खूब चोदो मुझे, मेरि इस तरह चुदयी करो कि जैसा मेरे पति ने कभि ना कि हो, खूब ज़ोर ज़ोर से चोदना मुझको। आज फद देना मेरि चुत को। रुकना मत।” मैने एक धक्का और लगया तो मेरा पूरा लुनद उसकि चुत मेन समा गया। उसने अपने पैरोन को मेरे कमर पर कस कर लपेत लिया। मैने भि उसकि चुदयी तेज़ि के साथ शुरु कर दि।
वो पूरे जोश मेन आकर बोलने लगि, “अह्हह्ह।।।। बहुत मज़ाआ आआअ रहाअ है और ज़ोर से बस मेरा पानि निकलने हि वलाअ है आआअ मैन आअ। गयीई और तेज़ तेज़।।। मैन उसके चिल्लने से और जोश मेन आ गया और उसे एक दम तूफ़न कि तरह चोदने लगा। पूरा बेद ज़ोर ज़ोर से हिल रहा था। इस समय मैन एक दम सतवेन आसमन पर था। इसि बीच मैने अपना लुनद पूरा बहर निकला और वपस एक झतके मेन हि उसकि चुत मेन दल दिया। वो चिल्ला उथि और उसने मुझे और ज़ोर से पकदा और लिपत गयी। वो पूरे जोश मेन आ गयी थि और जहदने हि वलि थि। 8-10 धक्कोन के बाद वो झद गयी। मुझे कोयी जलदि नहिन थि। मैने अपनि पोसितिओन बदल दि और उसे दोग्गी सतयले मेन कर दिया और उसके पीछे आ गया। मैने अपना लुनद उसकि चुत के बीच रखा और एक हि धक्के मेन अपना पूरा लुनद उसकि चुत मेन दल दिया। मैने अपनि एक उनगलि उसकि गानद मेन दल दि और बहुत हि तेज़ि के साथ उसकि चुदयी करने लगा।
मैन उसको इतनि तेज़ चोद रहा था कि वो अपने को समभल नहिन पा रहि थि और ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहि थि, “चोदो मेरे रजा, आज मेरि चुत कि चतनि बना दलो, अपना पूरा लुनद इसमेन दल कर खूब ज़ोर ज़ोर से चोदो, अपने लुनद के पानि से मेरि इस पयसि चुत को सीच दो, मुझे इस चुत ने बहुत परेशन कर रखा है। मेरा पति 2 महिने मेन केवल 5-6 बार हि चोद पता है। मैन भूखि रह जति हून। आज तुम मेरि चुत का घमनद एक दम चूर-चूर कर दो। तुम बहुत अच्चहा चोद रहे हो। आज मुझे इस चुदयी मेन जो मज़ा आ रहा है उतना मुझे अपने पति से चुदवने मेन कभि नहिन आया। इस चुदयी को मैन ज़िनदगि भर याद रखुनगि। मेरे पति ने मुझे कभि इतना मज़ा नहिन दिया। मुझसे बरदसत नहिन हो रहा है, तुम अपने लुनद का पानि जलदि से मेरि चुत मेन निकल दो।” मैने उसे बहुत जयदा जोश मेन देखा तो मैने अपनि पूरि उनगलि उसकि गानद मेन दल दि।
वो चिल्ला उथि, “कया कर रहे हो, दरद हो रहा है, मर जौनगि मैन, मत करो ऐसा, मुझ मेन इतनि तकत नहिन है कि मैन दोनो छेद मेन एक साथ बरदसत कर पऊन।” मैने एक हाथ से उसकि चुचियोन को मसलना शुरु कर दिया तो वो शनत हो गयी। वो अपना चुतद तेज़ि से आगे पीचे करते हुये मेरा साथ देने लगि। अब तक मुझे चोदते हुये लगभग 30 मिनुते बीत चुका था और मेरा भि पानि निकलने वला था। मैन उसे पूरे तकत के साथ और तेज़ि से चोदने लगा। 2 मिनुते मेन हि मेरा पानि निकला और उसकि चुत भरने लगि। मेरा पानि निकलते हि वो एक दम शनत हो गयी जैसे उसकि पयसि चुत को पानि मिल गया हो। इस दौरन उसकि चुत से भि 4 बार पानि निकल चुका था। मैने अपना लुनद उसकि चुत से बहर निकला तो देखा कि उसकि चुत एक दम सूज गयी थि कयोन कि मेरा लुनद सयद उसके पति के लुनद से मोता और लमबा था। उसकि चूचियन मेरे मसलने से एक दम लल लल हो गयी थि। मैन उसके बगल मेन लेत गया। हुम थोदि देर तक वैसे हि लेते रहे।
15 मिनुते बाद हि वो फिर से चुदवने के लिये तययर हो गयी। वो अपनि चुत को साफ़ करने के लिये बथरूम जना चहति थि लेकिन वो खदि नहिन हो पा रहि थि। मैने उसे सहरा देकर खदा किया और बथरूम ले गया। बथरूम मेन जकर उसने पहले मेरा लुनद सबुन लगकर साफ़ किया और उसके बाद वो अपना चुत धोने लगि। हुम बथरूम से वपस आये। वो बेद के किनरे पर एक तकिया रख कर बैथ गयी। मैने उसके सारे बदन को चूमना शुरु कर दिया। वो जोश मेन आने लगि। मैने उसकि चुत को चूमना शुरु किया तो वो एक दम मसत हो गयी। जोश के मरे उसकि चुत एक दम गरम हो गयी थि। मैने अपनि जीभ उसकि चुत के अनदर दल दि और घुमने लगा। वो पगल सि होने लगि और उसने मेरे सर को कस कर पकद लिया। वो एक दम सवरग का मज़ा ले रहि थि।
वो बोलि, “चतो मेरे रज़ा, मेरे पति ने कभि मेरि चुत को नहिन चता, मैन बहुत खुश नसीब हून कि मुझे अपनि चुत को चतवने का मज़ा भि मिल रहा है, मेरि चुत को चत चत कर इसका पानि निकल दो, आअ बहुत मज़ाआ आआअ रहाअ है और ज़ोर से बस मेरा पानि निकलने हि वलाअ है आआअ मैन आअ।।। गयीई और तेज़ तेज़।।।थोदि देर तक उसकि चुत को चतने के बाद वो झद गयी। मैने उसकि चुत से निकला हुअ सार जूस चत लिया। फिर मैने एक सरेअम ले कर उसकि गानद पर लगया। सरेअम लगने के बाद मैने अपना लुनद उसकि गानद के छेद पर रखा तो वो बोलि, “पलज़, मैन पहलि बार गानद मरने जा रहि हून, ज़रा धीरे धीरे करना। मैने कहा, “थीक है।” मैने अपना लुनद उसकि गानद मेन धीरे धीरे घुसना शुरु किया तो वो सिसकरियन भरने लगि। अभि तक केवल मेरा सुपदा हि उसकि गानद मेन घुसा था। मैने थोदा ज़ोर लगया तो मेरा लुनद उसकि गानद मेन 2″ तक घुस गया। वो रोने लगि तो मैने अपना लुनद बहर निकल लिया। वो कुछ समझ नहिन पयी। मैने अपना लुनद फिर से उसकि गानद के छेद पर रखा और पूरे तकत के साथ एक धक्का लगा दिया। मेरा आधा लुनद उसकि गानद मेन घुस गया। वो बहुत ज़ोर ज़ोर से चिल्लने और रोने लगि। मैने उसकि कोयी परवह नहिन कि और पूरे तकत के साथ एक ज़ोरदर धक्का और मरा।
मेरा पूरा लुनद उसकि गानद मेन घुस गया। वो बहुत ज़ोर ज़ोर से चिल्लने लगि और अपने सर के बाल नोचने लगि। मैन रुका नहिन और मैने अपना लुनद उसकि गानद मेन तेज़ि के साथ अनदर बहर करना शुरु कर दिया। थोदि हि देर बाद उसका दरद कम हो गया और उसे गानद मरने मेन भि मज़ा आने लगा। वो तेज़ि के साथ अपना चुतद आगे पीछे करते हुये गानद मरने लगि। लगभग 30 मिनुते बाद मैन उसकि गानद मेन हि झद गया। जब मेरे लुनद का पूरा पानि निकल गया तो मैने अपना लुनद उसकि गानद से बहर निकला।
उसकि गानद एक दम चौदि हो चुकि थि। उसके बाद हुम दोनो लेत गयी और आरम करने लगे। उसने उस दिन मुझे घर नहिन जाने दिया। पूरि रात वो मुझसे चुदवति रहि। मैने उस रात उसकि 4 बार चुदयी कि और 2 बार उसकि गानद भि मरि। आज तक वो अपने पति के ना रहने पर मुझसे खूब चुदवति है।जब उस को मरि जरुरत होति है मेरा को सल्ल कर दति है और मा 2 दिन बद उस का पस्स पहुनच जता हुन फ़िर हुम भन पेर 2/3 दिन रहतय है और इनजोय करतय है और बो बपसि पेर मेरा को पैसा दति है , हमरा आज भि या कम चल रहा है । अब उस को ऐक बछा होनय वल्ला है और ब। अगर कोइ और लदकि या औरत इनत्रेतसेद हो तो मुजको होतबोय4होतगिरल1986।सोम पेर मैल कर सकति है।

मिष्टर एन्ड मिसेज

मिष्टर एन्ड मिसेज विजय भनेर होटल खातामा नाम लेखाई उनीहरू रुमतिर लाग्छन्। मिसेज विजय लेख्दा उषालाई एउटा अलग अनुभव हुन्छ। ऊ मनमनै खुसी हुन्छे। साँझको खाना लिइसकेपछि दुवै कोठामा पुग्छन्। दुवैले एकले अर्कालाई नियाल्छन्। के गर्ने, के नगर्ने, असमाञ्जस्यमा पर्छन्। परिस्थिति विचार गरी विजयले बत्ती अफ गर्छ। उषालाई अङ्गालोमा लिन्छ र ओठमा चुम्बन गर्दै सुस्तरी बोल्छ- ‘सुत न थकाई लागेको छैन -’ विजयले भन्दा उषा मौन हुन्छिन्। विजय आफ्ना लुगा फुकाली नाइट ड्रेस लगाउँछ। उषा बसिरहेकी हुन्छिन्। विजयले विस्तारै उषालाई बिछ्यौनामा पल्टाउँछ। दिउँसोकै ड्रेसमा उषा ओछ्यानमा सुत्छिन्। विजय उषाको नजिकै आएर पल्टन्छ। केही क्षण दुवै मौनरूपमा सुतिरहेका हुन्छन्।बोल न उषा, के भयो - किन चुप लागेकी -’- विजय बोल्छ। ‘के कुरा गर्ने भन्नु न, तपाईं नै मेरो छेउमा हुनुहुन्छ, तपाईं भएपछि मलाई सबै पुगिसरी हुन्छ’- उषाले भोनिन्। ‘तिमी कति प्यारी छौ है, मलाई कति माया गर्र्छौ तिमी -’- ओठमा चुम्बन गरी आफ्नो हातले उषालाई सुस्तरी अङ्गाल्दै विजयले भन्यो। ‘तपाईं पनि त मलाई माया गर्नुहुन्छ नि। मलाई तपाईं जति प्यारो यो दुनियाँमा कोही लाग्दैन’- उषाले पनि विजयको चुम्बनको प्रत्युत्तर फर्काइन्।अब विजय उषाको अझ नजिक टाँसिएर सुत्छ। आफ्नो हात उषाको वक्षमा लगेर स्थिर गर्छ। विस्तारै त्यहाँ चल्मलाउन थाल्छ। ऊ अब उषाको मुखभित्र आफ्नो मुखले के-के खोज्न थाल्छ। उषाको शरीरको न्यानो स्पर्शले विजयलाई उत्तेजित बनाउँदै लग्यो। दिउँसो लगाएको लुगामा सुतेकी उषाको टिसर्ट विस्तारै विजयले माथितिर सार्न थाल्छ। टिसर्ट माथि सारिसकेपछि ऊ आफ्नो हात ब्राको हुकमा लगेर चलमलाउन थाल्छ। उषा ठूलो श्वास फेर्दै हुन्छे। ब्राको हुक खोल्न अप्ठ्यारो भएपछि उषाले विजयलाई सघाउँछिन्। विजय आफ्नो कार्यमा सफल हुन्छ। अब ऊ आफ्ना हातहरू उषाको पुष्ट वक्षमा ल्याएर स्थिर गर्छ। एउटा सानो बच्चाले गुडियासँग खेलेझैँ विजय उषाका स्तनसँग खेल्न थाल्छ। उत्तेजनाले बेला-बेला उषा विजयको ओठ चुस्छिन्। त्यस्तै विजय पनि उसको ओठ चुस्न थाल्छ। विजय हातको औँलाले उषाको नाइटोको गहिराइ नाप्छ। जुन उषाको पेन्टको टाँकमा चल्मलाउँछ। तुरुन्तै आफ्नो इच्छामा सफलता पाएपछि उषाको पेन्ट तल सार्न थाल्छ। सो कार्य गर्दा विजयलाई उषाले सहयोग गर्छिन्। उषा पेन्ट फालेर विजयसँग लपक्क टाँसिन्छिन्। विजयले आफ्नो चोर औँला उषाको योनीमा पसाउँछ। यसबेला विजयको हातले उषाको योनीबाट तरल पदार्थ निस्किरहेको अनुभूति गर्छ। ऊ उषाको योनी खेलाउँछ। कुनै परस्त्रीको प्रथम पटक सामीप्यता पाएको विजय उषाको हरेक अङ्गहरूलाई चाख लिई लिई निरीक्षण गरिरहन्छ। उषा बेला-बेलामा उत्तेजनाले विजयको ओठ टोक्दै हुन्छिन्। यसबेला विजयको काम नायक चाखका साथ उषाको महत्वपूर्ण अति गोप्य त्यही अङ्गसँग जोडिएको हुन्छ। उषा पनि उत्तेजित हुन्छिन्। केही बेर नबोलीकन विजयले काम सुरु गर्ला भनेर आशा गर्छिन्। तर विजयचाहिँ हातले खेल्नमै व्यस्त भएपछि उनी बोल्छिन्- ‘के गरिराख्नुभएको राजा, छिटो न आफ्नो काम गर्नुस्, कति मलाई तड्पाइरहनुहुन्छ -”मेरी प्यारी रानी, म तिमी तड्पेको सुन्न सक्दिन, त्यसैले अब आफ्नो काम सुरु गर्छु विजयले कुरा स्वीकार्छ। उषाको हात समातेर आफ्नो लिङ्गमा ल्याउँछ। आगोबाट हात झिकेझैँ गरी उषा फुत्त हात झिक्छे। विजय उषामाथि उक्लन्छ। उषा विजयलाई सजिलो पारिदिन्छे। विजयले फटाफट आफ्नो काम सुरु गर्छ। लिङ्ग प्रवेश हुनासाथ विजयलाई खूब आनन्द आउँछ। उषा भने पीडाले चिच्याउन थाल्छिन्- नाइँ-नाइँ, मैले सकिन छिटो बाहिर निकाल्नुस्…। विजयललाई उषाको पीडा सैह्य हुँदैन, त्यसैले विजयले आफ्नो कामनायक बाहिर निकाल्छ। ‘के भयो तिमीलाई - किन डराएकी, भन त -’ विजयले उषाको गाला मुसार्दै सोध्यो। ‘तपाईंलाई त मज्जा भयो होला नि, अर्कालाई के भइराखेको छ, ख्याल गर्नु छैन -’ लाडे बोली बनाएर उषाले भनी।’भन न त मैले के गर्नुपर्छ - म तिमीलाई पीडा भएको सहन सक्दिन क्या !’ विजय बोल्छ। ‘कस्तो साह्रो गरी कुहिनाले थिचेको - यत्रो ठूलो शरीर थामेकी छु। त्यहीमाथि कुहिनाले थिच्दा अर्कालाई दुख्दैन -’- उषाले विजयलाई वास्तविकता बताउँछिन्। विजय त्यो गल्ती दोहोर्‍याउँदैन। बडो सतर्कका साथ पहिले झैँ गरी विजयले आफ्नो काम सुरु गर्छ। आफ्नो नायकलाई लक्ष्यमा पुर्‍याइसकेपछि विजय तल-माथि गर्दै मच्चिन थाल्छ। हातले उनको सुकोमल स्तन मुसारिरहेको हुन्छ। त्यस्तै चुम्बन पनि गरिरहेको हुन्छ। दुवै आनन्दले सुत्छन् र निदाउँछन्।राति जब उषा ब्युँझिन्छिन्, उनलाई थाहा हुन्छ आफ्नो योनीक्षेत्रमा केही सल्बलाइरहेको छ, जसको उनलाई हल्का आनन्द पनि आइरहेको छ। उनी हात लम्काएर बेड स्वीच अन गर्छिन्। उज्यालोमा देख्छिन् त विजय उनका दुवै तिघ्रा फारेर बीचमा बसेर उनको गुप्तक्षेत्रमा जीब्रो पो चलाइरहेको ! बत्ती बलेपछि विजय उषालाई हेरेर थोरै हाँस्छ। उषा पनि मुस्कुराउँछे। विजय पुनः आफ्नो कार्य सुरु गर्छ। ऊ योनीको डिलमा आफ्नो जिब्रो चलाउँछ। उषाको बच्चाको जस्तो कलिलो योनीमा जिब्रो चलाउन उसलाई खूब मजा आउँछ। उषा पनि आनन्दले विजयको टाउको सुम्सुम्याउँछिन्। केही समयपश्चात् विजय उषाका स्तन प्रेमपूर्वक मुसार्दै आफ्नो जिब्रो लिङ्गझैँ योनीमा भित्र-बाहिर गराउँछ। उषा भुतुक्कै भएर सुस्केरा काड्छिन्। उनी भन्छिन्- ‘विजय, लौन, मलाई त खपिनसक्नु भयो, अब केही गर्नुस्।’ उषाले यसो भन्नासाथ विजय फेरि उषामाथि चढ्छ। उसले यसो गर्दा उषाको आँखाअगाडि विजयको विशाल लिङ्ग देखापर्छ भने विजयचाहिँ उषाको योनीतिर आँखा पुर्‍याउँछ। उषा विजयको लिङ्ग हातमा लिन्छिन् र प्रेमपूर्वक मुसार्दै चुस्न थाल्छिन्। उता, विजय दुवै हातले उषाको योनीमा चलाउन थाल्छ। यो क्रियाले दुवैलाई चरम आनन्द प्राप्त हुन्छ। केही समयपछि दुवै स्खलनको अवस्थामा पुग्छन्। विजय बोल्छ- ‘उषा केही छिन रोक त।’ ‘किन राजा -’ विजयको विशाल लिङ्ग मुखबाट निकाल्नै उषा बोल्छिन्। ‘म बग्न लागेँ, त्यसैले के।’ विजयले जवाफ दिन्छ।
मलाई पनि त्यस्तै भइरहेछ। यही मौकामा काम सिध्याउ न हुँदैन -’ विजय- ‘यति छिट्टै किन -’ उषा- ‘जागेपछि फेरि गर्ने नि, के आपत छ र ! हामी दुई छँदै छौँ क्यारे।’

‘त्यसो भए गरेर नै सिध्याउने त -’ यसो भन्दै विजय फर्किन्छ र उषाको योनीमार्गमा आफ्नो विशाल लिङ्ग लगेर राख्छ। विस्तारै दबाब दिन्छ। लिङ्ग योनीमा पस्छ। उषाका स्तन सुम्सुम्याउँछ। विस्तारै प्रहार गर्न थाल्छ। यसरी लयात्मक तरिकाले प्रहार गरेको उषालाई खुब रमाइलो लाग्छ। विजय जोडले प्रहार गर्न थाल्छ। उषा उसलाई उत्साहित गर्दै बोल्छिन्- ‘हो, अझ जोडले प्रहार गर्नु, हो-हो, यसरी नै।’ उषा यसो भन्दै विजयलाई हौस्याउँछिन्। दुवै उत्तेजनाले कराउँछन्। र, केही थप घात-प्रतिघातपछि दुवै शिथिल हुन्छन्। त्यसपछि यी दुई प्रेमी जोडी आनन्दपूर्वक टाँसिएर सुत्छन् र निदाउँछन्।

Tuesday, November 24, 2009

नेपाली सेक्स कथाहरु

यौन कथा
म धेरै खुसी थिए हुन पनि किन खुसी नहुनु एक बर्षको बिछोड पछी म मेरो श्रीमान सँग भेट हुदै थियो बिबाहा भएको २ महिनामै म बाटा टाढा भएको मेरो प्रियतमलाइ मैले भेट्दै थिए मैले बिहानै देखी कोठा सफा गरेर चटक्क बनाएकी थिए मेरो मनमा अनौठो उत्साहा थियो। यत्तिकैमा बाहिरा ढोकाको बेल बज्यो म आत्तिदै ढोका खोले म खुसीले पागल भए म हेरेको हेरै भए (ए लाटीके हेरेको यसरी) म झसंग भए मैले मेरो श्रीमानको कुट्टामा ढोग गरे उहाँले शिर तल लान नपाउदै के गरेको भन्दै मलाई निधारमा किस गर्नु भयो यत्तीकैमा बाबुआमालाई ढोग गरेर सबै कुरा सोध्न थाल्नु भयो उहाँहरु कुरा गर्न बेला सम्म मैले खाजा तयार पारेर ल्याए अनि सबै जान मिलेर खाजा खायौ उहाँले आफ्नो प्रियको हातको खाजाको अर्कै स्बाद हुन्छ भन्दा सबैजान हाँसे बिस्तारै साँझ पर्न थाल्यो म खाना बनाउन तर्फ लागे छिमेकी अंकल हरु लाहुरे सँग बसेर लाहुरे रमको मजा लिदै थिए यत्तिकैमा खाना खाइसकेर किचनको काम सकी म नुहाउन तर्फ लागे उहाँ पनि बाथरुममा आएर मलाइ जिस्काउन थाल्नु भयो मैले पनि कती जिस्काएको भन्दै पानी छ्याप्न के खोजेकी थिए उहाले मेरो स्तनमा समाएर किस गर्नु भयो म पागल सरी भए मेरो सम्पुर्ण शरिरमा नै 210v को करेन्ट दौडन थाल्यो तर म आफुलाइ कन्टोल गरी कोही आएर देख्छकी भनेर यताउता हेर्दै उहाबाट उम्कान खोजे तर नशाको तालमा उहाले निडर भइ मेरो गुप्तअंगमा हात पुर्याउनु भयो म केही गरी‍ उम्कन सकिन टाढाबाट कसैको खोकाइ सुनेर बल्ल उहाले मालइ छिड्नु भयो। जब म नुहाएर कोठामा प्रबेस गरे कोठामा त उहाँले दुइवटा गिलासमा रम हालेर राख्नु भएको मैले कति कर गर्द पनि पनी उहाँले मान्नु भइन मैले कहिले नखएको कुरा खदिन भन्दा पनि उहाले मान्नु भएन आखिर उहाको जिद्दीको अगाडी‍ मेरो केही लागेन म पनि पतिले दिएको बिष भए पनि केही हुदैन भनि पिउन थाले जब मैले एक घुट्की पिए मेरो छातिमा सिस्नोले पोले जस्तो भयो तै पनि उहाले मलाइ सास नफेरीकन अर्को एक घुट्कीमा सक्नु पर्छ भनेर कर गरेपछि मैले पनि सो बमोजीम गरे केही छिन पछी मलाइ नशा लाग्यो उहले आफ्नो एटेची बाट केही सिडी क्यासेट झिकेर dvd मा हाल्नु भयो म त कुनै राम्रो फिल्म भनेर सोचेकी थिए तर मैले कल्पना समेत नगरेको कुरा भयो उहाले ब्लु फिल्म पो लगाउनु भएको रहेछ त्यसपछी गिलासमा केही हुस्की लिएर मेरो नजिक आउनु भयो हामी दुबैले अब एउटै गिलासमा हुस्की पुउन थाल्यौ उहाले मलाइ तिमीले धेरै पिउनु हुदैन फेरी मजा हुदैन नि भन्नु भयो म निकै चाखलाग्दो गरी त्यो फिल्मको दृश्य हेरेकी थिए मेरो शरीर निकै उत्तीजेत भएको थियो मेरो गुप्तअंगको वरीपरी उहाको हात पर्दा पो मैले थाहा पाए मेरो शरीरको सम्पुर्ण बस्त्र उहाले माथी सारी सक्नु भएको रहेछ म पनि निकै आतुर थिए एक बर्ष देखीको प्यास मेटाउनलाइ तर मैले उहाको हात हटाउने प्रयास गर्दे थिए तर उहा आफ्नै तालमा मस्ती हुनु हुन्थ्यो मेरो कुनै कुराको वास्ता नै नगरी हुन पनि किन नहोस त दुइ प्यासीहरु एकआपासमा भेट हुदा उहाँको स्पर्षले मेरो माल बाटा पानीको मुल फुट्न शरु हुदै थियो म मा मेरो मुटुको रफ्तार बढिरहेको थियो उहाले मेरो योनीको प्वाल भित्र आफ्नो औला भित्र बाहिर गराउदै हुनुहुन्थ्यो मेरो गुप्ताङबाटा पानीको मुल फुटेको थियो हुन पनि एक बर्ष पछि मेरो योनीले परपुरुषको स्पर्ष पाईरहेको थियो केही छिनपछी उहाले मालाई उत्तानो पारेर सुताउनु भयो मैले सोचे आब उहाले काम शुरु गर्नुहुन्छ म पनि प्रतिक्षामा थिए उहाले आफ्नो सम्पुर्ण बस्त्र उतार्नु भयो कोठामा लाइट बलीरहेको थियो मैले उहालाई लाइट आफ गर्न भने तर उहाले मेरो कुरा मान्नु भएन उहाले आफ्नो शरीरको पेन्टी समेत उतार्न थाल्नु भयो म अलि लजाए केही बेरमा मुन्टो थोरै उठाएर यसो हेरेकी त उहा पुरै नाङ्गो हुनु हुन्थ्यो म उहाको नाङ्गो शरीरलाइ नियालेर हर्न थाले लाहुरे भएर होला कसीलो शरिर थियो यसो तल तिर हरेकी त उहाको माल निकै ठुलो देखे वरिपरी काला रौ हरु थिए मेरो मनमा डर लाग्यो उहाँको फनफनाउदो माल देखेर मैले सोचे पहिले पनि मेरो यौनीले यो मालको मजा लिइरसकेको थियो तर मालइ यति ठुलो भए जस्तो अनुभब भएको थिएन सायद मैले यो भन्दा पहिला कुनै पुरुषको नाङ्गो शरीर नदेखैर होला उहा बेडमा आइसक्नु भएको थियो म बत्ती निभाउन उठ्न के लागेकी थिए उहाले काहा जाने भनेर मालइ रोक्न थाल्नु भयो मैले बत्ती निभाउन भनि भन्दा उहाले मेरो स्तनमा आफ्ना हातले दबाएर किना निभाउनु पर्यो पर्देन भनि भन्नु भयो मा पनि कति बेला ऊहाको माललाइ प्रबेश गराउ भनेर प्रतिक्षामा बसे तर उहाले त मेरो प्रतिक्षाको बिपरित गर्नु भयो मेरो शरीरको सबै बस्त्रहरु पो उतार्न थाल्नु भयो मैले मानिना तर एक पुरुषको अगाडि म जस्ती स्त्रिको के लाग्छ र उहाले उतारी भ्याउनु भयो मैले सोचे अब त मेरो प्रतिक्षा पुरा उहा मलाइ उत्तानो नै पारेर सुताएर ठक मेरो अगाडि गएर मेरो टाङ् फट्टाउनु भयो मैले सोचे उहाले अब मालई दिना थाल्नु भयो भनेर तर यहाँ त सोच्दै नसोचेको कुरा भयो उहाँले मेरो यौनीमा आफ्नो मुख लगर चाट्न थाल्नु भयो म आत्तिए मैले उहालाइ के गरेको भनेर म उहाबाट उम्कन खोजे तर म सकीन उहाले मलाइ अब एक्काइसौ सताब्दीमा पनि यस्तो सेक्स गरेर हुन्छ अब त मोर्डन सेक्स गर्नु पर्छ भनि भन्नु भयो पुन उहाले मेरो यौनीबाट निस्कीएको रस चाट्न थाल्नु भयो म अचम्मित भए तर जब उहाले मेरो योनीलाइ बोकाले बाख्रीको चाटे झै गरी चाट्न थाल्नु भयो मलाई निकै आनन्दा लाग्न थाल्यो उहाले यौनीलाइ फट्टाएर जब मेरो यौनीको नरम अङ्गमा चाट्न थाल्नु भयो मलाई निकै आनन्दा आउन थाल्यो मेरो शरीरमा करेन्ट बग्न थाल्यो म बिचलित भए मैले उहालाई बस अब त भयो भयो भनि भन्दा पनि उहले मेरो यौनी चाट्न छोड्नु भएन झन् जिब्रो भित्र पुर्यायर चाट्न थाल्नु भयो केही बेरमा उहाले मेरो शरीरको सम्पुर्ण शरीरलाई किस गर्दे भन्न थाल्नु भयो O My dear ……॥ like your ……very sweet …। I love u भन्दै बडबडाउन थाल्नु भयो अनि मलाइ आफ्नो लिङ्ग चुस्नलाई आग्रह गर्न भयो उहाले लाख कोसीस गर्दा समेत मैले मानिन उहाले अन्तत आफ्नो हार सम्झी नेपाली भनेको कहिले माथी जादैनन् भन्दै आफ्नो माल मेरो यौनिमा छिराउने तर्फ लाग्नु भयो मेरो यौनी बाट धेरै पानी बगेको हुदा उहाको मालालाइ मेरो प्वल भुत्र छिर्न कुनै गार्हो थिएन उहाले मेरो यौनीको मुखमा आफ्नो लिङ्ग राखेर एक झड्का के दिनु भएको थियो लिङ्ग पुरै भित्र पस्यो उहले दनादन दिन थाल्नु भयो मलाइ निकै आनन्द आइरहेको थियो हुन पनि किना माजा नआओस त मेरो यौनी एक बर्ष देखी यसकै प्रतिक्षामा थियो उहा बिनाका पलहरु म कसरी बिताइराखेकी थिए प्रतेक रातमा मैले उहाको लिङ्गको नै कल्पान गर्ने गर्थे अब त म कल्पना गर्ने पर्ने थिएन उहा मेरो सामु हुनु हुन्थ्यो मेरो प्यास मेटाउनलाइ केही बेरमा उहाको स्पिड बढ्न थाल्यो मेरो मुख बाट केही शब्दहरु चुहिन थाले ओ ओ ओ आ आ आ आ जस्ता शब्दहरु मैले मेरो मुख बाट निस्केका शब्दलाई रोक्ना नै सकिना plz fast fast o yes yes yes यत्तिकैमा उहाले मलाई मेरा खुट्टा तल तानेर आफु खाट भन्दा बाहिर उभिनु भयो मेरा खुट्टालाई आफ्नो काधमा राखेर आफु ठाडो परेर मालई दिन थाल्नु भयो यसो गर्दा मलाई पहिला भन्दा पनि झन् मजा आउन थाल्यो उहाले पनि यो हो मोर्डन सेक्स भन्दै दनादन दिन थाल्नु भयो केही बेरमा उहाको रफ्तार बढ्यो छिटो छिटो दिन थाल्नु भयो म पनि अब थकित भएकी थिए उहले केही बेरमा मेरो यौनी बाट आफ्नो लिङ्ग झिकेर आफ्नो सारा माल मेरो मेरो शरीर भरी छरीदिनु भयो मैले यो के गरेको भन्दा उहाले म तिमीलाइ अझै केही बर्ष आमा बन्न दिन्न नि फेरी मजा नै हराउछ भनि भन्नु भयो तर मैले कसरि नी भनि प्रश्न गर्दा उहाले हाम्रो बच्चा भएमा यसरी काहा मोज गर्न पाइन्छ भनेर भन्नु भयो मैले पनि मन मनै यही कुरा सोचे उहा पनि यतिबेरमा धेरै थकित हुनु भएको थियो अनि म पनि हामी दुबैजाना लखतरान परी करिब आधा घण्टा जति बेडमा लडिरह्यौ त्यसपछि म उठेर तौलीया झिकी मेरो शरीको सबै पुछे अनि उहाको माल पनि पुछी दिए मैले यति गरेर कपडा लगाउन के खोजिकी थिइ उहाले मेरो हातबाट कपाडा खोसेर फ्यालीदिइ पुन मलाई बेडमा सुताछनु भयो अनि भन्न थाल्नु भयो अब देखो हामी यसरी नै नाङ्गै सुत्नु पर्छ अनि पुन शुरु हुनु भयो ।भनिन्छ कुकुरको लाडो पुती भित्र पसे पछि फुलेर ठुलो हुन्छरे तेहि भएर होला कार्तिक ,मंग्सिर तीर जहा गए पनी कुकुर हरु गठीयेरा बसी राखेको नादेखेको मान्छे संसरमा कमै मात्रमा होला । तेहि भएर होला कार्तिक मंग्सिरलाई हामी doggy season पनी भन्ने गरछौ । अनि केटी हरुलाई चिक्ना सबभन्दा डोगी style ले चिक्दा मजा अउछारे किन भने डोगी style ले चिक्दा भित्र भित्र सम्मा पुग्ने हुनले बड़ी इमोशन आउछारे । यो कुरा मैले धेरै केटी हरु संग sex interview लिए पछि थाह भएको हो
गुरु र चेलीको रोमान्स
बीएस्सी दिएर त्यसै बस्दा हात-मुख जोड्न ठूलो समस्या पर्ने भएकाले जागिरको खोजीमा लागेँ। सोर्सफोर्स नहुनेका लागि काठमाडौँमा जागिर पाउनु भनेको स्यालको सिंह पाउनुजस्तै हो। सरकारी कार्यालय तथा संस्थाका हाकिमहरूसँग फरियाको त के गोरु बेचेको समेत नाता नपर्ने भएकाले त्यतातिर जागिर खोज्ने प्रयासै मैले गरिनँ। साइन्स पढेको र काठमाडौँमा च्याउजस्तै उम्रिएका स्कुल भएकाले त्यतैतिर खोजी तलासी गर्न थालेँ जागिरको। दार्जीलिङेहरूले चलाएको एउटा कथित स्कुलमा बढीमा ६ महिनाका लागि माष्टरी मिल्लाजस्तो भयो। यो जागिर खोजिदिन मद्दत गर्ने पनि क्याम्पस पढ्दाको सहपाठी सुमित्रा भई। ऊ त्यही स्कुलकी माष्टर रहिछ। उसैका अनुसार विज्ञान शिक्षक बिरामीमा बसेकाले त्यो पद खाली भएको रहेछ।सुमित्रासँगै त्यस स्कुलमा गएँ। गोबरको थुप्रोजस्तो अनुहार परेकी प्रिन्सिपल रहिछे। शिष्टाचारवश नमस्कार गर्नै पर्‍यो। जम्माजम्मी तीन हजारभन्दा बढी तलब दिने भइनँ। काठमाडौँको महङ्गीमा जाबो तीन हजारले के गर्नु ? तर नहुनु मामाभन्दा कानो मामा नै निको भनेर त्यो माष्टरी पनि स्वीकारेँ।गाउँमा एसएलसी दिएर केही महिना माष्टरी गरेकाले पढाइमा केही ज्ञान पनि थियो। गाउँमा माष्टरी गर्दा त खुबै स्वाद भएको थियो, कोरेलीहरूलाई ट्युसन पढाउँदा। अलिकति राम्री केटीलाई एकान्तमा पर्‍यो कि तिम्रो फलानो विषय कमजोर छ, ट्युसन पढ्न आऊ भन्ने अनि दुई-चार दिन ट्युसन पढाएजस्तो गर्ने, त्यसपछि स्कुलको किताब में क्या रखा है, जवानीकी किताब पढो भन्दै यताउतीको गोटी मिलाएर रातारात युवती बनायो।एक पटक जिम्बालकी छोरी अमृतासँग खुब मोज मारिएको थियो। जिल्लाको सदरमुकाममा विभिन्न खेलकुदको आयोजना भएको थियो। उक्त खेलकुदमा भाग लिन मेरै नेतृत्वमा अमृतालगायत अन्य दुई केटी र पाँच जना केटाको टोली सदरमुकाम गएको थियो। हाम्रो स्कुलबाट जिल्ला सदरमुकाम पुग्न कस्सिएर एक दिन हिँड्नुपर्ने। बाटोमा एउटा आफन्त भेटियो। ऊसँग म अरूलाई हिँड्दै गर भनेर गफ गर्न थालेँ। एक घन्टाजति अलमल भयो। विद्यार्थीहरूलाई भेट्न म हस्याङ-फस्याङ गर्दै उकालो चढ्न थालेँ। आधा उकालोमा पुगेपछि अमृतासँग भेट भयो। ऊ हिँड्न नसकेर थला परेकी रहिछ। अरू साथीहरू अगाडि लागिसकेछन्। मधेसबाट बाबुले ल्याइदिएको चुच्चे जुत्ता लगाउँदा उसको यो हविगत भएको रहेछ। अमृताले खुट्टा कुँजो लागेर हिँड्नै नसक्ने भएको बताई। अमृता अब मेरो लागि घाँडो भई। जसरी भए पनि सदरमुकाम त पुर्‍याउनै पर्‍यो। 'ल मेरो कुममा अडेस लागेर बिस्तार-बिस्तार हिँड' भनेँ र उसलाई उठाएँ। अमृताले जीउको पूरै भार मेरो कुममा पारी र हिँड्न थाली। उसलाई थप भरथेग दिन मैले एउटा हातले उसको कम्मर समातेँ। एउटा हातले कम्मरमा र उसको छाती आफ्नोमा परेकाले अमृताको सम्पूर्ण भार थामेँ।उकालो हिँड्दा पनि मेरो पुंषत्व भित्रभित्रै जाग्न थाल्यो। त्यसपछि मैले जानाजान उसको कुरकुरे वैंशलाई कुत्कुत्याउन थालेँ। त्यसपछि मैले अमृतालाई एउटा हात मेरो कम्मरमा समाउन लगाएँ र आफ्नो हातले भने उसको कुम समाएर हिँड्न थालेँ। मेरो हात बिस्तारै कुमबाट छातीतिर सर्न थाले। अनि मैले उसको छातीलाई कस्न थालेँ। अमृताको जोड पनि मेरो कम्मरमा बढ्न थाल्यो। यही क्रममा एकछिन उकालो हिँडेपछि कस्तो तीर्खा लागेको, पानी खान पाए पनि हुन्थ्यो भनेर अमृताले आफ्नो टाउको सर्लक्क मेरो कुममा राखिदिई। हामी पानी खानलाई मूलबाटो छाडेर खोल्सातिर लाग्यौँ। खोल्सामा अलिकति पानी जमेको रहेछ। हामीले त्यही जमुवा पानी खाएर तीर्खा मेट्यौँ। कति शीतल रहेछ यहाँ त भनेर अमृता एउटा रुखको छहारीमा लम्पसार परी। म पनि अति नै थाकेको थिएँ, उसैसँग ढल्किएँ। 'खै सर, हात यता ल्याउनुहोस् न' भन्दै अमृताले मेरो हात तानी र त्यसैमाथि सिरान पारेर सुती। एकछिनपछि एउटा खुट्टा मेरो खुट्टामाथि चर्ढाई। खोल्साको चिसो र अमृताको यो व्यवहारले मभित्रको पुंषत्व जाग्न थाल्यो।'खुट्टा ज्यादै दुखेको छ ?'- मैले सोधेँ।'टेक्नै नहुने गरी पोलिराखेको छ'- अमृताले जवाफ दिई।खै त, त्यसो भए एकछिन माडिदिन्छु भनेर उठेर म उसको खुट्टा माडिदिन थालेँ। पिँडौलाबाट सुरु भएको यो खुट्टा माड्ने काम बिस्तारै-बिस्तारै माथि-माथि र्सन थाल्यो। अमृताले कुनै प्रतिकार गर्नुको बदला आनन्द मानेर आँखा चिम्लन पुगी। यसबाट म झन् उत्साहित भएँ। त्यसपछि खुट्टा थिच्ने काम उसको दोभानको छेउछाउमा पुगेर सीमित र सक्रिय हुन थाल्यो। अमृताको तिघ्रा मात्रै माडेर आफूलाई चित्त बुझेन। त्यस कारण एउटा हातले उसको छाती पनि माड्न थालेँ। अहिलेसम्म पनि अमृता आनन्दसँग आँखा बन्द गरेर ढल्किरहेकी छ।मैले बिस्तारै उसको कट्टु तल सारेर हेरेँ। भर्खर जुङ्गँरेखी बसेका रहेछन्। अनि मैले पनि आफ्नो सुरुवालको इँजार खोलेँ र ऊमाथि चढेँ। मेरो पुरुष अङ्ग लगेर ठाउँमै जोडिदिएँ। आम्मै के गरेको - भन्ने अमृताको प्रश्नको जवाफमा मैले उसको ओठ टोकिदिएँ। र, आफ्नो काम चालु गरेँ। अमृताले छट्पटाउँदै दायाँ र बायाँ गर्न थाली भने म काममा व्यस्त रहेँ। केही समयसम्म यही क्रम जारी रह्यो। म शिथिल भएँ। हामीले एकछिन थकाइ मार्‍यौँ र उकालो लाग्यौँ।सदरमुकाम पुग्दा झमक्कै साँझ परिसकेको थियो। बत्ती र यातायात नपुगेको हुनाले अन्य सदरमुकामझैँ यो सदरमुकाम पनि साँझ पर्नासाथै मानिसहरू बाटाघाटाबाट ओछ्यानमा पुगिसकेका हुन्छन्। हाम्रो स्कुलबाट आएको टोली पनि भातसात खाएर ओछ्यानमा ढल्किन थालिसकेको रहेछ भने होटलमा भात सकिएको मात्र होइन, भान्छा पनि उठाउने तयारी भैसकेको रहेछ। हामी पुगेपछि हत्त न पत्त होटल मालिक्नीले गुन्द्रुक र भात पकाइदिइन्। खाद्यान्नभन्दा भोक मीठो भनेर खाइयो। खाना खाने समस्या त टर्‍यो। तर अब सुत्ने समस्या खडा भयो। ओछ्यान खाटजति पहिले आइपुगेकाहरूले नै कब्जा गरिसकेका रहेछन्। होटल्नीले अमृता र मलाई त्यहीँ छिँडीको भान्छामै एक-एकवटा गुन्द्री ओछ्याई काम चलाउ कपडा दिइन्। दिनभरिको थकाइले गर्दा राम्रो ओछ्यानको भन्दा पनि हामीलाई थकाइ मेट्न पाए हुन्थ्यो भन्ने ध्याउन्न थियो। हामी आ-आफ्नो ओछ्यानमा पल्टियौँ।कता-कताबाट मनमा दिउँसोको कुरा खेल्न आएछ। लागेको निद्रा बेपत्ता भयो र दिउँसोको बाहिर-बाहिर मात्र दलेर छाड्नुपरेको सम्झिएर भित्रैसम्म पुर्‍याउने इच्छा मनमा प्रबल हुन थाल्यो। अमृताको भर्खर-भर्खर जुँगाको रेखी बसेको समतल भाग, प्वाट्ट उठेको दोभान अनि कस्सिएको छाती सम्झिएर आफूलाई ठ्याम्मै निद्रा लागेन। केही समय बिरालोको चालमा उठेर अमृताको ओछ्यानमा पुगेँ। त्यसपछि अमृतासँग लपक्क टाँस्सिएर उसको मुखमा आफ्नो मुख लगेर जोडेँ। उसले एउटा हात मेरो लिङ्गतिर लगेपछि थाहा भयो, उसलाई पनि निद्रा लागेको रहेनछ भन्ने। बिस्तारै मैले पनि आफ्नो हात जाङतिर लगेँ र खेलाउन र सुम्सुम्याउन थालेँ। अब हामी दुवैको थकाइ बेपत्ता भइसकेको थियो। त्यसपछि मैले बिस्तारै आफ्नो लिङ्गलाई उसको कापेतिर ल्यान्डिङ गर्न थालेँ।भित्र नहुल्नुस् है, साह्रै दुख्दोरहेछ, दिउँसोको जस्तै बाहिर-बाहिरै गर्नुहोस् भन्ने राय अमृताले बिस्तारै कानमा व्यक्त गरी। एक पटक पस्न मात्र गाह्रो हो, पसिसकेपछि कति मज्जा हुन्छ भन्ने तिमीलाई के थाहा - मैले पनि उसको स्वरमा भनेँ।'जति मज्जा भए पनि के गर्नु, तपाईंको त्यति लामो र मोटो छ। मैले कहिल्यै हालेकी पनि छैन। अघि दिउँसो अलिकति पस्दा त मरुँलै जस्तो भयो'- अमृताले आफ्नो स्थिति बताई। तिमीलाई साह्रो नपर्ने गरी बिस्तार-बिस्तार हाल्छु भनेर मैले आफ्नो नाललाई अमृताको तीनकुनेतिर सोझ्याएर जबर्जस्ती धक्का दिएँ। अमृता ऐय्या भनेर छट्पटाई तर मैले त्यसको कुनै प्रवाह पनि गरिनँ र उसलाई आफ्नो ठाउँ पनि छाड्न दिइनँ। एकछिन त उसको छट्पटाइमा कुनै कमी आएन तर केही बेरपछि उसको छट्पटाइ उत्तेजनामा बद्लिन थाल्यो। तैपनि मेरो आधाभन्दा पसेन। एकैचोटि गर्दा अर्को आपत आर्इपर्छ भनेर मैले आधामा नै आज चित्त बुझाउने विचार गरी धक्का दिन थालेँ। १५ मिनेटपछि ऊ पनि शान्त भई, म पनि शान्त भएँ।'कस्तो निष्ठुरी त्यसरी मर्ने गरेर पनि गर्नुहुन्छ ?'- अमृताले बिस्तारै भनी।'एक पटक न एक पटक छिराउन परिहाल्यो। आज नभए भोलि, मैले नभए अरू कोहीले धक्का दिइहाल्थ्यो, त्यसमा पनि मैले त आधा मात्र छिराएको छु'- मैले स्पष्टीकरण दिएँ। आधा छिराउँदा त आफ्नो ढाड झन्डै भाँच्चिएन, पूरै छिराएको भए त मेरो के गति हुन्थ्यो होला - भन्दै अमृताले कस्तोसँग टट्याउन पनि थाल्यो, के गर्ने होला भनी। त्यसो भए म एकछिन हातले सुम्सुम्याइदिन्छु भनेर अमृताको कापेमा बिस्तारै सुम्सुम्याइदिन थालेँ। मेरो सुम्सुम्याइबाट अमृताको दर्द मात्र हटेनछ कि उसमा उत्तेजना पनि बढ्न थालेछ। 'यही मोराले हो मलाई दुःख दिएको' भनेर च्याँठ्ठिदै मेरो कान्छो खेलाउन थाली। एकछिनपछि मेरो कान्छो लौरोजस्तो ठाडो भयो र मेरो मनमा पनि पाँच हजार भोल्टको उत्तेजना दौडिन थाल्यो। फलामले फलामलाई काट्छ भन्ने उक्ति सम्झेरै लिङ्गले पारेको घाउ लिङ्गले नै निको पार्छ भन्ने सम्झिएर म मेरी अमृतामाथि चढेँ। 'आम्मै कस्तो पापी, फेरि गर्न थालेको ?'- अमृताले भनी। यसले बनाएको घाउ यसैले निको पार्छ, तिमी र मलाई मज्जा हुन्छ भन्दै मैले आफ्नो कान्छो भाइलाई अमृताको कालो गुफामा धकेलिदिएँ। एकछिन छट्पटाएपछि अमृताको दर्द बेपत्ता भएछ। अब त ऊ तलबाट पनि धक्का दिएर आफ्नो जवानीको जोश देखाउन थाली। अमृताको जोश देखेर मैले पनि मेरो लिङ्गलाई पूरै हुलेँ र धक्का दिएँ। अमृताको टाइट पुतीमा चिक्न पाउँदा मलाई पनि एकदम मजा आएको थियो । एकछिन फेरि ऊ छट्पटाई तर मैले आफ्नो काम निर्वाधरूपमा जारी राखेँ। केही छिनपछि मेरो लिङ्ग निर्वाधरूपमा भित्र-बाहिर गर्न थाल्यो। अमृता पनि तलबाट मच्चिन थाली। अब बल्ल अमृता पूरा तरुनी भएकी थिई र उसको भावी लोग्नेलाई कुनै परिश्रम गर्नै नपर्ने भएको थियो। सिता भाउजु सँगको त्यो रमाइलो पलहरु.....
म बारम्बार गई रहन्थे त्यो घरमा किनकी मलाई त्याहा जानु मज्जा लाग्दथ्यो .. म रमेश दाइको कुरा गर्दैछु । रमेश दाइको बिहे भएको धेरै भएको छैन जम्मा जम्मी त्यस्तै सात बर्ष जती भएको होला । हुन त बिहे भएको त धेरै नै पहिला हो तर वहाँको पहिलो श्रीमती पोइला गएको रे मलाई त्यत्ती राम्रो सङ्ग थाहा छैन । अहिलेको श्रीमती भने सायद मेरै उमेरको होला सानै नै छ र निकै चन्चल स्वभाव को चंचल पनि किन नहोस् आखिर उमेर पनि त छ नि । म त्यो घरमा गैइरहन्थे रमेश दाइले पनि मलाई देख्न साथ बोलाइहाल्थे अनी सिता भाउजुले पनि देखेपछी बोलाईहल्थिन र मलाई पनि त्यो घरमा जानु एकदम मज्जा लाग्दथ्यो सायाद केही थियो जसले मलाई त्यो घर जानु तानी रहन्थ्यो । सदा झै म एकदिन बेलुकिको हावा खानु निस्केको थिए बाटैमा रमेश दाईलाई भेटे वहाँ कुखुराको मासु किनेर आउँदै हुनुहुदो रहेछ मलाई देखेपछी आफ्नु घर जाने कर गर्न थालनु भयो एकछिनको आनकानी पछी म लुरु लुरु रमेश दाइको पछी पछी लागे । हामी घर पुगिसकेको थियौ रमेश दाइको बुडी बाहिरनै उभिरहनु भएको रहेछ हामीलाई देख्नसाथ भित्र पस्नु भयो हामी पनि सरासर भित्र पस्यौ । नमस्ते भाउजु भन्दै म पनि भित्र कोठाको सोफामा थचक्क बसे भाउजु पनि नमस्तेको उत्तर दिदै नजिकै आएर बस्नु भयो … ख्है मासु दिनोस र तपाईं दोकान गएर आउनुहोस् भन्दै मासु को पोका रमेश दाई देखी लिएर भाउनु भान्छा कोठातिर पस्नु भयो रमेश दाइपनी एकैछिन बस्दै गर ल भाई भनेर दोकान तिर लाग्नु भयो । भित्ता को घढी मा आँखा पुर्‍याउदा बेलुकिको ७.३० भएको रहेछ टि.भी मा कुनै हिन्दी सिरिएल चलिरहेको थियो । त्यत्तिकैमा भाउजु भित्र पस्नु भयो उही मादक मुस्कान अनी हरिण को चालामा मलाई हेर्दै मुस्कुराउदै । मलाई यसरी हेरेको आज मात्रा हैन सिता भाउजुले प्राय सधैं जसो नै हेर्ने गर्नु हुन्थ्यो त्यसैले त म यो घरमा तानिएर आउथे । सिता भाउजु मेरो नजिकै आएर सोफामा बस्नु भयो अनी मेरो हातमा आफ्नु नरम नरम हात राख्दै भन्नु भयो आज तपाईंको लागिनै खास यो सब गरिदै छ नि बाबु !! म अचम्म मान्दै सिता भाउजुको अनुहारमा ताक्न थाले .. फेरी पनि वहाँ मुस्कुराउदै भन्नु भयो यो मेरो अनी रमेश दाइको मिलेमतोमा नै भएको हो !! अझै पनि म कुरा बुझ्न सकिरहेको थिएन हैन आज सिता भाउजुलाई के भएको छ ? किन यस्तो नबुझ्ने पारामा कुरा गर्दै हुनुहुन्छ ? टि.भी तिर आँखा घुमाउदै भाउजु ले फेरी भन्नु भयो जनोस बाबु बाथरुम मा गएर हात खुट्टा धुनोस र आएर बस्नोस …. मैले हवस मा टाउको हल्लाउदै बाथरुम तिर गए .. सिता भाउजु पनि म सङ्गै उठ्दै साबुन र टावल लिदै मलाई दिनु भयो म सरासर नुहाउने कोठामा पसे । जाबो हात खुट्टा धुदा पनि किन ढोकाको चुकुल लगाउने यही सम्झेर हल्का ढोका ढेपेर त्यसै छोडि मुख धुन थाले मलाई पत्तै भएन भाउजु नुहाउने कोठामा पस्नु भएको हातमा बाल्टी थियो सिता भाउजुको मैले सम्झे शायद भाउजु पानी लिन आउनुभएको होला त्यसैले आफ्नै धुनमा मुख धुदै थिए तर सिता भाउजुले त ढोकाको चुकुल पो लगाउन थालनु भयो त म एकछिन त अलमल परे केही बोल्नै सकिन … मुटु एकदम जोड जोडले धडकिन थालेको थियो शायद अब आउने त्यो पल सम्झेर सारा शरीर नै सिरिङ्ग बनेर आयो । सिता भाउजुको हात ले मेरो हातलाई समाउदा पो म झसङ्ग भए !! सिता भाउजु निकै उत्तेजित भएकी थीइन वहाँको श्वास प्रश्वास निकै तिब्र गतिमा थियो र म पनि निकै उत्तेजित थिए तर पनि आफुले आफुलाई सक्दो स्वंयम अपनाउदै सिता भाउजुको कान मा भने दाई आउनु भयो भने के सोच्नु हुन्छ होला ? तर वहाँलाई त केही कुराको डर नै नभए जस्तो मेरो हात लगेर आफ्नु हिमालचुली जस्तो चुचो छात्ती मा छोडिदिनु भयो उफ त्यो पल कस्तो हुन्छ शायद त्यो त मलाई मात्रा थाहा होला के गरु के नगरु ? यस्तो राम्रो मौका किन गुमाउनु जस्तो पनि लाग्यो र अर्को मनले मान्दैन थियो किन कि सिता भाउजु रमेश दाइको नाशो थियो केहीछिन को लागि मलाई आफ्नै भाई सम्झेर बाहिर जानु भएको थियो फेरी म यो सब कसरी गर्न सक्छु वहाँको अनुपास्थिती मा ? तर पनि खै के भएको म आगोमा घ्यु पग्ले जस्तै पग्लिदै थिए मेरो दिमाग नै बिबेकहिन बनेको थियो त्यो समय । मैले सिता भाउजुको त्यो मोटो ओठ्मा चुस्दै पो थिए अनी मज्जाले वहाँको आनारदाना माडिरहेको थिए उफ्फ कसरी खप्न सक्नु एक जवान तरुनी केटीको समिप्य म पागल नै बने मैले सिता भाउजुको ब्लाउज भित्र हात पुर्‍याएर दुधको मुन्टोलाई मजाले खेलाउन थाले … मलाई अब कत्ती पनि अबेर गर्नु उचित लागेन छिटो भन्दा छिटो म सिता भाउजु को त्यो ठाउमा आफ्नु लिङ्ग छिराउने प्रयास मा थिए सिता भाउजु पनि शायद यही चाहन्थिन मैले छिटो छिटो सिता भाउजुको भित्री कट्टु खोल्दै आफ्नु पनि खोलिसकेर छिराउने मात्रा के प्रयास गरेको थिए ढोका खुलेको आवाजले म एकदम नराम्रो सङ्ग झस्किन पुगे । सिता भाउजु पनि हत्त र पत्त लुङ्गी मिलाउदै कट्टु त्यही बाल्टिमा फालेर ढोका खोलेर बाहिर निस्कनु भयो अनी म हाथ खुट्टा धुने नाटक गर्दै बसे ।रमेस दाइले सायद भाउजु नुहाउने कोठा बाट निस्केको देख्नु भएनछ के रे वहाँलाई थाहा नै भएन । मलाई भने खपी नसक्नु भएको थियो सो ढोकाको चुकुल लगाएर पुरै नाङ्गै भएर नुहाउन थाले नुहाउदै मैले आफ्नु लिङ्ग खेलाउदै सिता भाउजुको चुचो स्तन सम्झदै आफुले आफुलाई स्खलित बनाए . बाहिर निस्किदा सिता भाउजुले मासु पकाएर सक्नु भएछ । अब भने हामी मासु र बियर तान्नु सुरु गर्यौ सिता भाउजु हाम्रै छेउमा बसेर गफ सुन्दै हाम्रो गफमा साथ दिदै हुनु हुन्थ्यो । हामी पिउदै गई रहेको थियौ भने सिता भाउजु मज्जाले गफ दिदै बसिरहनु भएको थियो धेरै पछी रमेश दाई र मेरो कर मा सिता भाउजुले पनि २ गिलास जत्ती पिउनु भयो बियर …… पिउदा पिउदै रातिको १२ पो बजिसकेछ रमेश दाइले हात को घडी हेर्दै भन्नु भयो लु अब सुत्ने हैन त ? म पनि ल अब म जान्छु भन्दै उठे तर रमेश दाई र सिता भाउजुले आज यही सुते हुँदैन र भन्दै कर गर्नु भयो मैले पनि नाइ नास्ती गरिन हुन्छ भन्दै फेरी बसे । रमेश दाई ल भाई सुत्नु है भन्दै बेडरुमा तिर पस्नु भयो सिता भाउजु भने आउनुस् हजुरलाई म बेड बनाइ दिन्छु भन्दै लिएर अर्को कोठा म जानु भयो । मलाई कोठा मा छोडेर सिता भाउजु आफ्नु कोठा म पस्नु भयो .. मलाई कत्ती पनि निन्द्रा लागिरहेको थिएन छट्पटी लागिरहेको थियो मलाई केही छिन पहिलाको सिता भाउजु सङ्ग को कृयाकलाप झल्झली याद आईरहेको थियो साथमा रक्सी को नशा । म बिस्तारै उठेर रमेश दाई र सिता भाउजुको को सुत्ने कोठा तर्फ गए बत्ती जलिरहेको रहेछ ढोका को सानो दुलो बाट भित्र चिहाए भित्र त आम्मै … रमेश दाई उफ्रिदै रहेछ सिता भाउजु माथि म मज्जाले हेर्दै बसे … खपी नसक्नु भएको थियो मलाई म फेरी आफ्नु लिङ्ग खेलाउदै स्खलित बनाए र छिटो छिटो सुत्ने कोठा तिर गए । बेडमा पल्टिन साथ मलाई निन्द्रा लागेछ भुसुक्कै निदाएछु राती पो मलाई कसैले सुमसुमाइ रहेको रहेछ उठेर हेरेको सिता भाउजु पो त्यो पनि पुरै नाङ्गै अनी त के हुनु र झम्टे सिता भाउजु लाई अनी सिता भाउजुको योनी मा उफ्रिन थाले खाट कराउदै थियो चुइ चुई निरन्तर ….. निरन्तर …..

जवनीको जोस

जेठ महिनाको त्यो शनिबार , म आफ्नो कोठाभित्र पढ्न बसेकि थिएं । दिउँसोको त्यस्तै साढे बार बजेको हुंदो हो । बाहिर लागेको चर्को घामले रुखविरुवाका पातहरु लल्याकलुलुक भएर ओईलिएका थिए । थोपै हावा नचलेर बसिनसक्नु भएको थियो मेरो कोठा अझ त्यसमाथी माथीबाट जस्ताको छानो तातिएर पग्लेला झैं भएको । त्यो उखुम गर्मीमा म किताब खोलेर त बसेकि थिएं तर पढाईमा भने पटक्कै मन थिएन । बैसाख जेठको गर्मीमा केटीहरुलाई कुखुरा पालुं कि पोईला जाउं जस्तो हुन्छ भन्थे सांच्चै त्यस्तै भएको थियो मलाई । कोठाभित्र गुम्सिएर म अनेक रंगीन कल्पनामा डुब्दै थिएं । मेरो शरिरमा पातलो सुतीको म्याक्सी मात्र थियो । म्याक्सीभित्र पेण्टी र ब्रा फुकालेर मिल्काई सकेकि थिएं । एक त गर्मीले गर्दा शरिरमा टाँसिने कपडाहरु लगाउनै नसकिने त्यसमाथी यसरी रोम रोम रोमाञ्चित हुने कल्पनाको रंगीन संसारमा डुब्दा मलाई त्यस्ता कपडाहरुले अवरोध खडा गरेको महसुस हुने गर्छ । पढ्नको लागी खोलेको किताब खुल्लै मेरो पेटमाथी घोप्टो परेर नाईटोमा मुख जोतिरहेको थियो । म यौटा हातले म्याक्सी माथी बाटै आफ्नै छाती खेलाईरहेकि थिएं । मलाई आफैंले छाती खेलाउंदा थोरै दुख्ने गरेर स्तनको मुण्टो निचार्यो भने आनन्द लाग्छ - त्यसैले पनि होला मेरो छातीको गोलाई र स्तनको मुण्टो निक्कै सप्रेको निबुवा जस्तो ठुलो ठुलो भएको । म उत्तानो परेर बिछ्यौनामा मडारिईरहेकि थिएं । मडारिने क्रममा तलबाट म्याक्सी सुर्किईएर पेट सम्म आएको थियो । म अर्को हातले भने बाक्लिएर कालो हुंदै जाने क्रममा भएका रहर लाग्दा योनिक्षेत्रका रौंहरु मुसार्दै थिएं । वाताबरणमा भएको गर्मी र मेरो रंगीन कल्पनाले उमारेको जोसको संमिश्रणले गर्दा मलाई मेरो योनि भित्रबाट ज्वालामुखी विष्फोटन भएर लाभाहरु छरिन्छ कि जस्तै लाग्दैथियो । विष्फोटनकै संकेत स्वरुप मेरो योनिको मुखभागबाट निस्किएको चिल्लो चिप्लो पदार्थ मेरो हातले स्पर्स गर्दै गर्दा ढोकाबाहिरबाट आमा कराउनु भयो , " ए ! सानी , आज त बाख्राहरु मरिसकेहोलान । जा जा पानी लगेर दे अनि सिँयालमा सारेर आईज । " मेरो एकाग्रतामा खलल पुर्याउंदा मलाई झनक्क रिस उठ्यो तर ‘कहाँ छन बाख्रा ?’ मैले सोधें । " खै कोनि त कहाँ छन ? बिहान लगेर कहाँ खुटेकि थिईस ? " आमाको जवाफले पो थाहा भयो बाख्राहरु त म आफैंले लगेर बिकाशहर्को खेतमा खुटाएर आकि थें । " लु जा झट्ट , मरिसकेहोलान बाख्राहरु त ।" आमाको आवाज क्रमश मधुरो हुंदै गयो सायद मेरो ढोकाबाट फर्किसक्नु हुंदैथियो । यो तातो घाममा बाख्राहरु भएको ठाउं सम्म पुग्नु पर्ने हुंदा मरे जतिकै लागेको थियो मलाई तर विकाशलाई त्यहाँ भेटिन सकिने संभावनाले मलाई जाँगरिलो बनायो । म सपनाबाट ब्युँझिए झैं उठें र यौटा तौलिया कम्मर मा बेह्रें यसो गर्दा पातलो म्याक्सीभित्रको मेरो बिना पेण्टीको योनिको आकार र योनिक्षेत्रका रौंहरु लुक्न सक्थ्यो । टाउकोमा सानो रुमाल राखेर घाम छेल्दै म बाल्टीभरी नुनपानी बोकेर बाख्राहरुलाई खुवाउन हिडें । बाख्राहरु भएसम्म पुग्नलाई खेतैखेत झण्डै २० मिनेट हिंड्नु पर्थ्यो । म बाटै भरी विकाशलाई सम्झंदै थिएं । हुनपनि अति साह्रै सोझो छ बिकाश । म प्रत्येक पटक उ संग नजिक पर्दा उसको स्पर्सको भोकी हुन्छु तर उसलाई भने केहि वास्तै छैन । मैले आँखाहरुले लाखौं पटक प्रेमको निवेदन हालीसकें तर विकाशले कहिल्यै बुझ्न सकेन । धेरै पटक एकान्तमा भेट हुंदा मैले जानी जानी स्तनहरु उसको कुम छाती तिर रगडेर प्रणयको खुल्ला निमन्त्रणा दिईसकें तर उसलाई कुनै असर हुंदैन । सानै देखि नदेखेको , नजानेको भए म विकाशमाथी यौनाङ्ग छैन कि भनेर शंका गर्न सक्थें तर सानोमा संगै खेल्दा हरेक पटक विकाश आफैं अघि सरेर लोग्नेको भुमिका निभाउंथ्यो भने मलाई स्वास्नीको भुमिका निभाउन बाध्य पार्थ्यो । हामी निर्धक्क भएर बाख्राका पाठापाठीहरु उक्लाउक्ली गरे झैं खेल्थ्यौं । भातपकाई ( भाँडाकुटी ) बाट शुरु हुने हाम्रो बालखेल संधै लोग्ने स्वास्नी भएर लोग्ने स्वास्नीको भुमिका निर्वाह गर्दै बच्चा ( झुम्राको ) जन्मिउञ्जेल सम्म खेल्ने गर्थ्यौं । सानोमा यस्ता सबै खेल खेल्न सिकाउने मेरो नायक आज कसरी यति धेरै सोझो भयो ? मनभरी बिकाशलाई बोकेर म एकसुरमा हिंड्दै गर्दा विकाशकै आवाजले म झस्किएं -’ ए! सानी , तिम्रो बाख्राहरु यहाँ ल्याईदिएको छु , पानी पनि ख्वाईदिएं है । ‘ म बाल्यकालको स्मृतीमा हराईरहेकोले होला एकपटक त विकाशले ए! सानी खेल्न आउ न भनेको जस्तो लाग्यो तर यथार्थमा विकाशले भनेको मैले बुझिहालें । गाउँ देखि निक्कै पर हम्मेसि मान्छेहरु आईनपुग्ने स्थानमा उसकै खेतको बिचमा भएको घना बाँसघारीको सिँयालमा उसका अनि मेरा पनि बाख्राहरु सारेर किताब पढ्दै बसिरहेको थियो विकाश । ढुंगो खोज्दा देउता मिल्यो भन्दै म उ भएनेर गएं । उ किताबमै मस्त थियो । बाल्टीको पानीले खुट्टामा लागेको धुलो पखाल्दै बोल्ने बहाना झिकें - ‘ कति पढ्छौ विकाश ? अल्छि लाग्दैन ? ‘ ‘ लाग्दैन है । ‘ किताबबाट नजर नहटाई सोझो जवाफ दियो उसले । ‘उफ कति साह्रो गर्मी । तिमीलाई गर्मी भएन ? ‘ मैले उसको ध्यान भंग गर्ने हेतुले कम्मरमा बाँधेको तौलिया खोलें । मलाई बिश्वास थियो यदि उसले हेर्यो भने मेरो पातलो म्याक्सी भित्र माथी छातीतिर आकाश छुने रहरले चुलिएका दुई टाकुराहरु र तलपट्टी अरुणको गल्छि अनि त्यहाँको बनस्पती जगत स्पष्ट देख्नेछ । म उसको नजिकै बस्नलाई तौलिया ओछ्याउने उपक्रममा लागें । उसले मलाई हेर्यो र तुरुन्तै भन्यो , ‘ छि ! तिमी त यत्री ठुलि भएर पनि कट्टु नलाएकि ? ‘ सरलपनाको पनि यौटा हद हुनु पर्ने हो तर मेरो योनि र त्यस वरीपरीका रौंहरु स्पष्ट देख्दा पनि उसमा कुनै उत्तेजना आएन क्यार । उसको नजर फेरी किताबमै अडियो । म तौलियामाथी उसको छेवैमा बसें र भनें ,’ तिमीलाई यो सुकेको झारले बिझाएन ? यो तौलियामा बसन ।’ बटन खुल्ला भएको मेरो म्याक्सीबाट बाहिर निस्कन खोज्दै गरेका दुबै स्तनहरुले विकाशलाई ल आउ खेलौं भन्ने अपिल गर्दैथिए । ‘ नाईँ अब म घर जान्छु , तिमी नै बस । ‘ किताब बन्द गरेर उठ्न खोज्दै थियो विकाश । मैले हत्तार उसको हात समातेर आफु तिर तानें म यौटा खुट्टा सिधा अगाडी तन्काएर र अर्को खुट्टा तेर्सो पारेर घुंडादेखि केहि खुम्च्याएर बसेकि थिएं । आधा उठिसकेको अवस्थाबाट सम्हालिन नपाउंदै विकाश मेरो काखमा मुख जोतेर लड्यो । उसको तिखो चुच्चो नाक म्याक्सी बाहिरबाटै मेरो योनिको माथ्लो भागमा धस्सिएको मिठो महसुस गरें मैले । सायद उसले पनि पहिलो पल्ट मेरो यौवनको मादक सुगन्धको अनिभुती गर्यो होला । उसले बिस्तारै टाउको उठाएर भन्यो - ‘ तिमीलाई त लाज शरम केहि छैन सानी । अब त हामी ठुला ठुला भै सक्यौं त । कहाँ सानोको जस्तो गरेको ? ‘ मैले विकाशको हात छोडेकै थिइनं । छोड्यो भने उ भाग्छ भन्ने मलाई थाहा थियो । म विकाश संग सानोमा गरेका सबै कृयाकलापहरु दोहोर्याउन चाहन्थें । उसैले सानोको कुरा झिक्दा मलाई अझ अघि बढ्न सहज भयो र भनें - ‘ अनि के त ? सानोमा म अर्कै तिमी अर्कै थिईनौं त , सानोमा गर्न हुने अहिले गर्दा चैं के हुन्छ ? ‘ विकाशको अनुहार लाजले रातो भएको थियो । मेरो अनुहारमा पनि उत्तेजनाको लाली थियो होला । मेरो हातबाट आफ्नो हात छुटाउने प्रयत्न गर्दै विकाशले भन्यो , ‘ सानोको जस्तै अहिले गर्दा तिमी सांच्चैको आमा भयौ भने नि ? अब त सानोको जस्तो झुम्राको नानी जन्मिदैन त ? ‘ ‘ जन्मे के त ? बिहे गरेर बसौंला नि । कि तिमी मलाई बिहे गर्दैनौ ? म त तिमी बाहेक अरु संग त मरे नि बिहे गर्दिन । तिमीलाई त मेरो मायापनि लाग्दैन कि के हो ? ‘ रिसाएको नखरा पार्दै मैले भनें । विकाश अवाक भएझैं मेरो आँखामा हेर्न लाग्यो । उसको अनुहारमात्र हैन कानहरु पनि राता राता भएका थिए । उ आगोको समिप परेको नौनी झैं पलपल पग्लिंदो थियो । लाजले रातो भएको उसको अनुहारमा क्रमश उत्तेजनाको रंग थपिंदै थियो । बिस्तारै उसले मेरो गालामा हात राखेर कपालका केश पन्साउंदै भन्यो ,’ लाग्छ नि सानी , धेरै धेरै लाग्छ तिम्रो माया तर माया लाग्छ भनेर जताततै पोख्दै हिंड्नु हुंदैन नि , हैन र ? ‘ बिकाशको आँखामा कताकता आँशु छचल्किएको थियो । उसले त मलाई चोखो माया साँचो अर्थमा गर्दोरहेछ । मैले पो बुझ्न नसकेको रहेछु उसको मायालाई । त्यसबेला मलाई आफ्नो उत्ताउलोपना देखेर एकैछिनको लागी आफैं संग एकैसाथ लाज र घिन लागेर आयो । मेरा आँखाभरी आँशु भरीए । त्यती धेरै जोश बोकेर विकाश संग यौन कृडामा लिप्त हुने अभिलाशा बोकेर आएकि मैले विकाश संग माफ माग्न पनि सकिनं । सायद उसले मेरो आँखाले गरिरहेको याचना बुझ्यो होला दुबै हातली मेरो दुबै गालामा भएको केशहरु पन्साउंदै लगेर कान मुन्तिर कसिलो गरेर समाई मेरो ओठमा चुम्बन गर्यो । मेरा हातहरु विकाशको पाखुरा मुनितिरबाट पिठ्युँमा पुगेर उसलाई कस्न खोज्दैथिए । चुम्बनको क्रम केहिबेर चलिरह्यो । हामीदुबै एक अर्काको क्रमश दुबै ओठहरु चुस्नेक्रममा थियौं । मैले आफ्नो तल्लो ओठ उसको दुबै ओठको बिचबाट फुस्काएर फुस्फुसाएको स्वरमा उस्लाई थ्याङ्क यु आई लभ यु भनें । उस्तै स्वरमा बिकाशले पनि आई लभ यु टु भनेर मेरो जिब्रो माग्यो । मैले आफ्नो जिब्रो उसको मुखभित्र छिराएं । बडो तन्यमताका साथ विकाशमेरो जिब्रो चुस्न लाग्यो । जिब्रो चुसाउनुको आनन्द मलै पनि भै रहेथ्यो । पालैपालो हामी एक अर्काको जिब्रो चुस्तै गर्दा बिकाशको हात मेरो स्तनमा खेल्न लागिसकेको थियो । मलाई केहि हिम्मत बढ्यो र अनुरोध गरें , ‘विकाश आज एक पटक सबै गरौं न प्लीज । ‘ हामी दुबै जिब्रो चुस्ने क्रममा तौलियामाथी लडिसकेका थियौं । अहिले बिकाशको मुख म्याक्सीबाट जबर्जस्ती बाहिर निस्किंदै गरेको मेरो दाईने स्तनमा थियो । यौटा हातले उसले मेरो घिचुकमा कपालको केश मुठ्याएको थियो भने अर्को हात मेरो योनि क्षेत्रतिर डुलाउंदै थियो । यस्तोबेलामा सायद शरिरलाइ दिमागले नियन्त्रणमा रख्न सक्दैन होला मेरो हात विकाशको घुँडासम्म आउने हनुमाने कट्टुभित्र पसेर कडा लिङ्ग संग खेल्न लागे । सानोमा देखेछोएको भएपनि जवानभएपछि कल्पना मात्र गरेको विकाशको लिङ्ग मेरो कल्पनामा झैं लम्बाई र गोलाईमा थियो । सानोमा उसिनेको सखरखण्डको त्यान्द्रो जस्तो देखिने बिकासको तुरी अहिले मेरो मुठ्ठीमा अटाई नअटाई थियो । मैले मुठ्ठीमा नापीरहेको उसको लिङ्ग मेरो योनिभित्र सम्म छिराउन पाएहुन्थ्यो जस्तो लागेर मैले पुन अनुरोध गरें तर मेरो अनुरोधको उल्टो असर परे झैं विकाश हठात मेरो शरिरबाट अलग भयो र मैले तानेर तल पुर्याईदिएको कट्टु माथी सार्दै बोल्यो , ‘ अहिले नै गर्ने र सानी? कोहि आए भने? ‘ म पनि अलि सम्हालिएर यताउता हेरें । त्यहां वरपर बाँधेका बाख्राहरु हामी के गरिरहेछौं भन्ने जिज्ञासा भएझै हामीलाई हेरिरहेका थिए । अलि पर्तिर मेरो घरको बोको विकाशको घरको पाठीमाथी उक्लेर डल्लो पर्दैथियो । ‘ को आउँछ र यहाँ ? ‘ मैले प्रतिप्रश्न गरें र उठेर एकै ठाउँ गुजुल्टिएको तौलियालाई फेरी सजिलो गरि ओछ्याउन थालें । तौलिया ओछ्याउनको लागि म आधा निहुरिएको अवस्थामा हुंदा पछिल्तिरबाट विकाश आएर उसको लिङ्ग मेरो योनिभागमा पर्ने गरी रगड्न थाल्यो । उसको दुबै हात मेरो स्तनमा खेल्न लागेका थिए । म घुंडा टेकेर उ भएतिर फर्किएं र उसको लिङ्ग हातमा खेलाउन थालें । मैले एकाध पटक ब्लु फिल्महरुमा केटीहरुले लिङ्ग चुसेको अनि केटाहरुले योनि चाटेको देखेको थिएं । अबेरै नगरी मैले विकाशको लिङ्ग आफ्नो मुख भित्र हालें र लालीपपझैं चुस्न थालें । ‘ अरे सानी , यो के गरेको ? ‘ विकाश भन्दैथियो । सायद उसले म यती अगाडी बढ्न सक्छु भन्ने सोचेको थिएन । केहिबेर सम्ममात्र विकाशको लिङ्ग मेरो मुखभित्र रगडिएको के थियो मैले आफ्नो किलकिलेमा तातो पानीको सिर्का महसुस गरें साथै विकाशको मुखबाट आह!!! को आवाज निस्किएको सुनें । क्रमश बिकाशको लिङ्गले भातको माड जस्तो बाक्लो तातो चिप्लो तरल पदार्थ छाड्न थाल्यो । उसको बिर्यको केहि भाग मेरो मुखभित्र के पसेको थियो मलाई वाकवाकी आयो । मैले विकाशको लिङ्ग आफ्नो मुखबाट बाहिर निकालें र उसको विर्य ओकलेर फालें । पुरानो जमानाको टेको कलमले झै छादीरहेको विकाशको लिङ्ग आफ्नो योनिमा छिराउन खोज्दैथिएं म । ‘ मलाई त भयो सानी ।’ बिकाश बोल्यो । उ पुरै स्खलन भै सकेको थियो । म भने प्यासी नै थिएं । विकाशले मलाई समाएर उत्तानो पारेर लडायो र आफु म माथी घोप्टो परेर चढ्यो । मेरो ओठमा एकपटक म्वाईं दिएर उ मेरो स्तनमा झर्यो र दुबै स्तनका मुण्टो क्रमश चुसेर फेरी उ मेरो योनि भागमा सर्यो र दुबै हातका बुढिऔंलाहरुले मेरो योनिको दुई गालाहरु च्यातेर मेरो योनि चाटीचुटी पारेर चुस्न थाल्यो । यौनकृयामा हामी मान्छेहरु पनि पशुहरु भन्दा कम कहाँ रहेछौं र ? बरु पशुभन्दा अझ तल झरेर हामी दुई रतीरागको धुँवा उडाईरहेथ्यौ । सायद पहिलो प्रयास भएर होला विकाश केहि छिट्टो स्खलित भएको थियो मेरो पनि हालत त उस्तै थियो । विकाशले च्याती च्याती मेरो योनि चुस्ता म पनि धेरै बेर कहाँ टिक्न सकें र ? बर्खेखेतको समाहा फुटेर लेदोपानी बगेझैं म पनि एकैछिनमा तौलियामाथी छ्यालब्याल भएर पोखिएं । केहिबेर सम्म हामी एकार्काको अँगालोमै बांधिईरहयौं र उठेर दुबै सम्हालिएर बस्यौ । ‘ विकाश हामीले गर्ने काम त गरेनौ नि ?’ मैले सोधें । ‘ के भयो त? गरेको भए तिम्रो यहाँ बच्चा हुन्थ्यो नि त । ‘ मेरो पेट सुम्सुम्याउदै विकाशले भन्यो , ‘ तिमी कुमारी आमा भयौ भने नि ? ‘ विकाशको कुरा ठिकै थियो । कुमारी आमा भएर घरपरिवारको छि छि र समाजको दुरदुर हुंदै सबैले थुकेको सम्झंदा त आज झैं प्रत्येक पटक यसैगरी उम्लिएको जवानी तौलियामै पोख्नपाए जाती हुन्छ जस्तो लाग्यो । निक्कै बेर पछि अर्को पटक ब्यवस्थित भएर ढाल सहित यस्तै भेटघाट गर्ने बाचा गरेर म घर फर्कें विकाशपनि आफ्नो बाटो गयो । एउटै गाउँ भएपनि विकाशको र मेरो घर अलि टाढै पर्थ्यो । निक्कै दिन भएको थियो हाम्रो भेट नभएको । विकाशले मलाई प्रेम गर्छ भन्ने थाहा पाएदेखि मेरो भुईँमा खुट्टानै थिएन । मन पनि सिमलको फूल जस्तो ( भुवा हो हुनत फूल भन्छौ हामी ) हलुँगो भएको थियो । त्यसै नाचुँ नाचुँ जस्तो लाग्थ्यो । विकाशलाई भेट्न जान मन लागिरहेको थियो त्यसैले धेरै अगाडी देखि म संग रहेको विकाशको कापी पुर्याउन जाने बहाना बनाएर जाने विचार गरें र ऐना अगाडी बसेर सिँगारिन थालें । मलाई सिँगार गर्नै पर्ने त थिएन तर पनि आफ्नो मनपर्ने मान्छे संग जाँदा अलि राम्री हुन मनलागेको थियो । अनुहारको सिँगार पटार सकेर म ऐनामा हेर्दै आफ्नो स्तन खेलाउन थालिसकेछु । म किन यस्ती बहुलाई भएकि ? आफैं छक्क पर्छु । सायद मेरो प्रकृती नै यस्तो हो कि ? अलिकती फुर्सद पाएंभने म किन यौनाङ्गहरु खेलाउंछु ? विकाशले भनेझैं म उम्लिएर पोखिन बेर छैन । विकाशको कुराको सम्झनाले सम्हालिएर म विकाशको घर गएं । सुनसान थियो घर । सायद कोहि थिएनन । म फर्कन लाग्दै गर्दा विकाशकि दिदीले बोलाउनु भयो , ‘ अरे सानी ? किन आकि थ्यौ ? फेरी फर्कन लाग्यौ त ? ‘‘नमस्ते कुसुम दिदी ‘ नमस्ते गर्दै म बोलें , ‘ म त कसैलाई नदेखेर जान आँटेकि । यो विकाशको कापी दिनु थ्यो र । विकाश कहाँ छन? ‘‘ ए ! विकाश र बाबा त हिंजो पुने जानु भयो त । हाम्रो विकाशलाई पुनेमा पढाउने अरे । साँच्चि तिमी कहाँ पढ्ने ?’ नमस्ते फर्काउंदै कुसुम दिदीले सोध्नु भयो । हाम्रो प्लस टु ( दश जोड दुई ) को पढाई सकिएको थियो । भर्खरै परिक्षाफल निस्किएर अब अगाडी कहाँ पढ्ने भन्ने कुरा हुंदै थियो ।‘ खै दिदी , बुबाले त काठ्माण्डौ पठाउंछु भन्नु भएको थियो । उतै पढ्छु होला आण्टीको मा बसेर । ‘ मैले भनें , ‘ अनि दिदी म संग त बिकाशले काठ्माण्डौ नै पढ्ने भन्थे त ? ‘‘ भन्छ नि त्यसले । बाबाले त्यसलाई पुनेबाट एम बि ए गराउने भन्नुहुंदैछ । बि एम सि सि मै पढ्छ होला त्यो पनि । ‘ त्यही ब्रेहान महाराष्ट्र कलेज अफ कमर्समा कुसुम दिदीले पनि पढ्नु भएको थियो । अहिले बिहे भै सकेर साउने पानी छल्न आउनुभएको थियो दिदी । नाम अनुशार नै राम्री हुनुहुन्थ्यो कुसुम दिदी । सानोमा हामीलाइ ट्युसन पढाउनु हुन्थ्यो । कतिपल्ट विकाश र मलाई लोग्ने स्वास्नी भई खेल्दै गर्दा रंगेहात पक्रनु भएको पनि थियो । पछि सम्म पनि मलाई भेट्दा के छ बुहारी भनेर जिस्काई रहनुहुन्थ्यो त्यसैले म कुसुम दिदीको नजिक त्यती पर्दिनंथें । कुसुम दिदी अझै के के भन्नु हुंदैथियो तर यता मेरो मनमा भने चट्याङ्ग परिसकेको थियो । काठमाण्डौमा पढ्न गएपछि स्वतन्त्र भएर विकाश संग घुम्न पाउने कल्पनामा डुब्न थालिसकेकि मलाई दिदीको खबरले मर्माहत बनायो । म टोलाएको देखेर होला दिदीले के भयो सानी , किन टोलाएकि भन्नु हुंदै थियो । म केहि हैन दिदी भन्दै बिदा भएर घर फर्कें ।मलाई विकाश संग बेस्करी रिस उठेको थियो । आवोस न अनि जानेकि छु भन्दै म मुर्मुरिरहेकि थिएं तर विकाश पुनेबाट फर्किनु अगाडी नै मलाई पनि काठमाण्डौ जानु पर्यो । म पनि बुबासंग काठमाण्डौ गएं । मैतीदेवीको यौटा गल्लीभित्र आण्टीको घर थियो । म पहिले आउंदा आण्टीहरु महाराजगंजतिर बस्नु हुन्थ्यो । मलाई यो काठमाण्डौ पहिले पनि मननपरेको यो पाली पनि मन परेन । कसरी यस्तो ठाउँमा बसेर पढ्नु होला ? कि पछि बस्दै गएपछि राम्रो लाग्छ कि ? मैले पढ्ने कलेज चाहिँ नयाँ बानेश्वरमा थियो । कलेज शुरु भएपछि हरेक बिहान मैतीदेवी मन्दिर अगाडीबाट कलेजको बसमा जानु पर्ने ।सबैकुराको निधो भएर भोलिपल्ट बिहान हामी घर फर्किने भएका थियौ । अघिल्लो साँझ म मौका छोपेर एक्लै घुम्न निस्कें । मलाई केहि कण्डोम किन्नु थियो । हुनत विकाशले अबको भेटमा म कण्डोम लिएर आउंछु भनेको थियो तर म भन्दा सोझो छ विकाश । नल्याएर पछि मलाई त किन्न लाज लाग्यो सानी भन्न सक्छ । मैले पनि किनिंन र उसले पनि ल्याएन भने उ संगको मेरो संभोगको ईच्छा अर्को भेटमा पनि तुहिएर जान सक्छ ।साँझको बेला जुन पसलमा पनि मानिसहरुको धुईरो थियो । धेरै मानिसहरु भएको पसलमा गएर कण्डोम माग्न मलाई कता कता कुरि कुरि लाग्दै थियो तर मेरो लागि ग्राहकको घुँईचो नभएको पसल कहाँ हुन्थ्यो र ? जे परोस , म नकिनि नछाड्ने अठोटमा पुगें र अलि सुनसान देखिने यौटा पसलमा छिरें । पसले अलि उमेर ढल्केको काठमाण्डौकै रैथाने जस्तो देखिन्थ्यो । बाहिर पट्टी बेञ्चमा यौटा युवक चुरोटको मज्जा लुट्दै थियो । सायद पसले र त्यो युवक बात मार्दै थिए ।‘ साउजी , मलाई एक प्याकेट कण्डोम दिनुहोस न प्लीज । ‘ मैले पसलेतिर मुखरित भएर भनें । रेडियो ट्युनिङ्ग गर्दै पसले कुनै समाचार खोज्दैथियो वा एफ एममा गीत खोज्दैथियो , झस्किएर अलि ठुला ठुला आँखा ( भन्छन नि विस्फारित लोचन ) बनाएर म तिर हेरेर बोल्यो , ‘ हजुर के भन्नु भो टपाईंले ? ‘ उसको अनुहारको भावले प्रष्ट पार्थ्यो कि उ अचम्ममा परेको छ अनि मलाई जिस्काउने दाउमा पनि । ‘ मैले भने कि , मलाई एक प्याकेट कण्डोम दिनुहोस । ‘ दोहोर्याएं मैले ।‘ ए हस् ‘ बनावटी नम्रताको साथ भन्यो उसले , ‘ तर टपाईं ट बे भको जस्टो डेखिडैन । हेर्डा अझै कुमारी डेखिन्छ । ‘पसलेको कुराले मेरो रिसको पारो एकैचोटी माथि चढ्यो । म अलि कडा भएर बोलें , ‘ हेर्नुस साउजी , तपाईं मतलब भन्दा बाहिर जानुहुंदैछ । म कुमारी हुँ या बिवाहिता हुँ या बिधवा हुँ त्यो संग तपाईलाई के को टाउको दुखाई ? तपाईँ पसल थापेर बस्नु भएको छ र पसलमा कण्डोम पनि बेचिन्छ भनेर यत्रो बोर्डपनि राख्नु भएको छ । जब बेच्न तपाईं बस्नु भएको छ भने ग्राहकहरु किन्न आउंदा फेरी के को आपत्ती ? ग्राहकहरु कुमारी हुन कि बिवाहिता हुन कि बुढि हुन ; बेच्नेले रिपोर्ट त राख्नु पर्दैन होला नि ? ‘ पसले कण्डोमको प्याकेट तिर लम्कंदै थियो । बेञ्चमा बसेको युवक राम्रै चित्त बुझेझैं गरेर हाँस्यो र भन्यो , ‘ सहि कुरा हो । तपाईंलाई के आपत्ती नि साउजी , जस्लाई जे आवस्यकता हुन्छ उसले त्यहि किन्छ —- ‘ चिन्नु न जान्नु घचेटीमाग्नु । उसको कुरालाई बिचैमा काटेर म उ तर्फ लक्ष्य गर्दै बोलें , ‘ धन्यवाद महाशय । तर तपाईं चुरोटकै मज्जा लिंदै गर्नुहोस । हाम्रो बिचमा तपाईंको आवश्यकता छैन । ‘ उ चुप लाग्यो तर यता साउजीको घैंटोमा घाम लागेझैं पसल थर्काउंदै कुनै रेडियो नाटकमा राक्षस हाँसे झैं हांस्न थाल्यो ।एकैछिन त मलाई त्यहाँ हाँसोको पात्र बन्दैछु कि जस्तो पनि लाग्यो । मलाई त्यहाँबाट कन्डोम लिएर छिट्टो उम्कन पाए हुन्थ्यो जस्तो भएर पसलेलाई अलि छिट्टो गर्न भनें । पसलेले कन्डोमको प्याकेट म तर्फ बढाउदै भन्यो , ‘ ल लिनुहोस बैनी , मैले ट टपाईँलाई नराम्रो भन्न खोजेको ठिंन टर टपाईँ ट टेसै रिसाउनु भो टर आज सम्म मेरो पसलमा केटी आर कण्डोम किनेको मलाई ठा ठेन । ‘पैसा तिरेर मैले कण्डोमको प्याकेट आफ्नो ह्याण्ड ब्यागमा राख्दै भनें , ‘ धन्यवाद । आज देख्नु भयो नि हैन ? धन्दा नमान्नुस मैले कण्डोम किनें भनेर कसैले तपाईंको पसल अगाडी टायर बाल्दैन न तपाईंले केटीलाई कण्डोम बेच्नु भयो भनेर कसैले तपाईंको पसल बन्द गर्छन ।‘ म पसलबाट निस्किएं । बाहिर बसेको युवक नसकिने भयो आजभोलीका केटीहरुलाई भन्दैथियो । म सुनेको नसुन्यै हिंडिदिएं । उनिहरुले सायद मेरो निक्कै कुरा काटे होलान । काटे के त ? म आफुलाई चाहिने जे सुकै कुरा किन्न सक्छु नि । किन मान्छेहरु जाबो कण्डोम पनि केटीले किन्दा चाँही गैह्र कानुनी काम भए जत्तिकै गर्छन ? यस्तै सोच्दै म आण्टीको घर पुगें ।भोलीपल्ट बिहान सबेरै हामी फर्कियौं । साँझतिर घर आईपुग्दा मलाई साह्रै खुशी लाग्यो । मलाई आफ्नो गाउँ भन्दा प्यारो अरु कुनै ठाउँ पनि लाग्दैन । सबैलाई त्यस्तै हुँदो हो । केहि दिनको लागी म कतै गएं भने कहिले आफ्नो घरगाउँ फर्कनु जस्तो लाग्छ मलाई । प्रत्येक साँझ घाम अस्ताउंदा र प्रत्येक बिहान घाम झुल्किंदा मलाई आफ्नै घरगाउँमा हुन पाए हुन्थ्यो जस्तो लाग्छ । अझ त्यसमाथी यो पल्ट विकाश संगको भेटमा हुने आनन्ददायि यौनकृडाको कल्पनाले मलाई त्यसै त्यसै पुलकित बनाएको थियो ।भन्नलाई त मान्छेहरु अजिँगरको आहारा दैबले जुराउंछ भन्ने गर्छन तर विचरा अजिँगर आहारा नपाएर महिनौं सम्म भोकै पनि बस्दो हो नि ; भन्नेहरुलाई के थाहा ? त्यस्तै विकाश र मेरो भेट हुने दिन पनि जुर्न आँटेको थिएन । पढ्नलाई विकाशको पुने जाने दिन र मेरो काठमाण्डौ जाने दिन नजिकिंदै थियो । म भित्र भने अति नै छट्पटी भै रहेको थियो । आफुले किनेर ल्याएको कण्डोमको प्याकेट कैले यो ब्यागमा कैले त्यो झोलामा लुकाउथें म । हुनत मेरो कोठामा पसेर छापछाप्ती गर्ने कोहि थिएनन तर पनि कसैले भेटीहाल्ला कि भन्ने जस्तो हुन्थ्यो । दिउंसो भने म त्यसलाई कुनै उपायले साथमै राख्थें । कतै विकाश संग भेट भएर त्यसको सदुपयोग गर्ने अवशर मिलिहाल्छ कि भन्ने आशा मनमा हुन्थ्यो ।एकदिन त्यसरी नै छट्पटीदै म कोठामै बसिरहेकि थिएं । बुबा सधै झैं आजपनि बिहानै अफिस जानु भएको साँझमा मात्रै फर्कनु हुन्थ्यो । आमा पनि आज किनमेल गर्न बजार जानु भएको थियो । फर्कन आमालाई पनि निक्कै समय लाग्थ्यो । भाई साथीहरु संग मिलेर गुलेली खेल्न कुन मुलुक पुगेको होला । छुट्टी छ आजभोली त्यसको स्कूल पनि , त्यसैले खेल्नमा मस्त हुन्छ दिनभर साँझ गाँस टिप्न आईपुग्छ । म घरमा एक्लै थिएं । ब्यागबाट कण्डोमको प्याकेट निकालेर हेर्दै मनमनै बेकारै हुनेभयो भन्दैथिएं । एक्कासी तलबाट विकाशले बोलाएको जस्तै लाग्यो । भ्रम होला । विकाशको बारेमा धेरै सोचेर मलाई प्राय यस्तै भ्रम हुन्छ । फेरी विकाशकै आवाजले मलाई बोलाएको सुनें । झ्यालबाट तल चिहाएर हेर्दा विकास आँगनबाट मेरै झ्याल तिर हेर्दैथियो ।मेरो खुशीको सिमा रहेन । विकाशलाई माथी बोलाएं । उ कोठाभित्र छिर्नासाथ म उसलाई अंगाल्न पुगें । विकाश संग मलाई उठेको रिस मरिसकेको थियो तर उ पो म संग रिसाएको रहेछ । ‘ सानी तिमीले यो के लेखेको ? कति सम्झाउंदा पनि नमान्ने तिमी त । ‘ उसले यौटा कागजको टुक्रामा मैले उसैलाई लेखेको प्रेमको चिठ्ठी देखाउंदै भन्यो , ‘ दिदीले सबै हेर्नु भएछ । मलाई त दिदीले पो दिनु भएको । धन्न घरमा कसैलाई भनिदिनु भएन ।‘त्यो चिठ्ठी मैले विकाशको कापीमा लेखेको थिएं र विकाशलाई पुर्याउन गएको दिन कुसुम दिदीलाई छोडेर आएको थिएं । त्यतीबेला मलाई त्यो कापीभित्र चिठ्ठी लेखेको छु भन्ने होस नै भएनछ । विकाशलाई अंगालोमा कस्दै मैले भनें , ‘ तिम्री दिदीले मलाई बुहारी भन्न हुन्छ भने मैले वहाँको भाईलाई चिठ्ठी लेख्न हुंदैन ? ‘विकाशले मलाई अंगालो हालेर उचाल्दै मेरो पलङ्गमा बसायो । उसको नजर टेबलमा मैले राखेको कण्डोममा परेछ । के के न भए जस्तै गरेर भन्यो , ‘ अरे यो काँ बाट आयो ? ‘‘ मैले किनेर ल्याएकि नि , तिमी किन्छौ कि किन्दैनौ भनेर ।‘ उसले तुरुन्तै आफ्नो खल्तीबाट कण्डोम निकाल्दै भन्यो , ‘ ल्याको थें नि मैले पनि ।‘उसले जिन्सको पाईण्ट लगाएको थियो । त्यसैमाथी बाट उसको लिंग सुम्सुम्याउंदै मैले भनें , ‘ आज काम लगाउनु पर्छ यस्लाई । ‘वयस्क भै सकेपछि को यो हाम्रो दोश्रो मिलन थियो । पहिलो मिलनमा भन्दा आज अलि बढि अनुभवी भएझैं देखिन्थ्यो विकाश । आज मैले कुर्ता सलवार लगाएकि थिएं । कुर्ता माथिबाटै मेरा कसिएका दुई स्तन खेलाउदै हुन्छ भन्यो र मेरो गर्दन तिर चुम्न थाल्यो । त्याँहा त्यतीबेला कोहि आउलान भन्ने मलाई डर चिन्ता थिएन । मैले तलबाट माथितिर सोहोरेर कुर्ता फुकालें । महिनौं सम्म कारावासको सजाय भोगेर उन्मुक्ती पाए झैं मेरा दुई स्तनहरु आजाद भए तर लगत्तै फरार कैदी प्रहरीको गिरफ्तारीमा परेझैं दुबै स्तनहरु विकाशको पञ्जामा गिरफ्त भए ।म विकाशको पाईण्ट खोल्ने उपक्रममा थिएं । बटनहरु मैले खोलिसकेपछि विकाशले आफैं पाईण्ट उतार्यो । उसको टाईट पाईण्टसंगै अण्डर वेयर पनि निस्किएर जाँदा विकाशको लिँग रिसाएको गोबन सर्प फणा फुलाएर दुलोबाट निस्किएझैं मलाई झस्काउंदै म तिर तेर्सियो ।उसको गतिलो लिँग देख्नासाथ म मा चुस्ने ईच्छा भएर होला मेरो जिब्रोको फेदतिरका सम्पुर्ण र्‍याल ग्रन्थीहरु रसाएर मुखभरी पानी भरिएर आयो तर आजको हाम्रो अभिष्ट त्यो थिएन त्यसैले उसको लिँगलाई हातले मुसारेर उसलाई पलङ्गमा तानें र भनें , ‘ विकाश म कण्डोम लगाईदिन्छु ल ? ‘विकाश मेरो सलवारको ईँजार खुस्काउंदैथियो , बोल्यो , ‘ हैन म आफैं लगाउंछु । ‘ उसले मेरो चिप्लो कपडाको सलवार खुट्टातिरबाट तानेर फुकालिदियो र पेण्टीमाथीबाटै केहि माथी उठेको मेरो योनिलाई सिँगो समोसा टोक्नखोजे जस्तै गरेर बिस्तारै टोक्यो र चुम्दै भन्यो , ‘ सानी आज किन तिम्रो भुत्ला घोच्ने भएको ?’मैले भर्खरै कैंची लगाएर योनि क्षेत्रका रौंहरु हल्का छाँटेकि थिएं त्यसैले अलि दह्रो भएर होला मेरा रौंहरु पेण्टी छेडेर बाहिर निस्किन खोज्दै गरे जस्ता देखिन्थे । ‘ मैले छाँटेकि थिएं नि त । साह्रो घोच्यो र ? ‘ मैले सोधें ।‘ हैन अलि बिझाउने भएछ । ‘ विकाशले मेरो पेण्टी तल सोहोर्दै भन्यो । म सर्बाङ्ग नाङ्गी भएकि थिएं । यौनकृडामा हामी दुई न त अनभिज्ञ थियौं न त पारंगत । प्रकृतीले नै सिकाउने यस्तो कलामा भन्नु पर्दा हामी दुबै शिकारु थियौं । मैले विकाशलाई उसको टी शर्ट फुकाल्न भनें , ज्ञानी बालकले झैं उसले आफ्नो टी शर्ट खोल्यो र फेरी मेरो योनिमै मुख गाड्न थाल्यो । उ आफ्ना दुई ओठहरुले च्यापेर ढाडीएको किसमिस जस्तो मेरो भगशिश्न चुस्तै थियो । म उन्मादले छट्पटीन थालें । मेरो मुखबाट उन्मादका उदगारहरु निस्किन थाले । म मा सकेसम्म छिट्टो रतीराग अलाप्ने धून सवार थियो त्यसैले विकाशलाई छिट्टो गर्न भनें । विकाशले कण्डोम झिकेर आफ्नो लिँगमा लगायो र म माथी चढ्न आयो । मैले उसलाई सजिलो पार्ने हेतुले तिघ्रा फारेर उत्तानो सुतेको अवस्थामै केहि चटपटाएर आफ्नो शरिर मिलाएं । त्यसै त उत्तेजनाले पानी पानी भएको मेरो योनि त्यसमाथी विकाशको लिँगमा चिप्लो तैलिय पदार्थ सहितको कण्डोम , मलाई एकै झट्कामा विकाशको लिँग मेरो योनिभित्र फेदै सम्म छिर्छ जस्तो लागेको थियो तर कहाँ त्यस्तो हुंदो रहेछ र ? क्रमैसंग अलि अलि गर्दै विकाशको लिँग मेरो योनिभित्र छिर्दै थियो । उसको लिँग मेरो योनिभित्र पसिरहँदा मलाई केहि पिँडाको महसुस भै रहेको भए पनि त्यो पिँडा मिठासपुर्ण थियो ।विकाश मेरो शरिरमा लपक्कै टाँसीएर मच्चिईरहेको थियो । मुखमा मुख जोडेर हामी एक अर्काको जिब्रोको स्वाद पनि लिँदै थियौं । केहिबेरको परिश्रम पछि विकाश स्खलित भएछ । उ सायद उसैले सोचेको भन्दा छिट्टो स्खलित भएछ क्यार असंतुष्टी पुर्ण स्वरमा बोल्यो , ‘ ला सानी मेरो त झर्न थाल्यो ।‘ यता मेरो भने तिर्खा अझै बाँकी थियो । मलाई विकाशले अझै निक्कै बेर मेरो पलङ्गको डसनामै भासिने गरेर माथिबाट तल मच्चिएर थिचिरहे हुन्थ्यो जस्तो लाग्दैथियो । विकाशले उसको लिँग मेरो योनिबाट झिक्यो । उसको लिँगमा भएको कण्डोम विर्यको तापले पग्लिएर टुप्पोमा स सानो कचौरीमा भरी हुने जति विर्य सहित लिँग देखि तल झुण्डिएको अवस्थामा थियो ।‘ ए ! त्यो त भएनछ नि , तिमीले लगाउन जानेनौ कि क्या हो ?’ मैले भनें । ‘ खै होला । मैले लगाउनै नजानेर हो कि यो लगाएर मज्जा नै आएन ‘ , होसियारी पुर्बक आफ्नो लिँगबाट कन्डोम झिक्दै विकाश बोल्यो , ‘ काँ फाल्ने यस्लाई ? ‘उसको लिँगमा भएको कडापनमा अलि ह्रास आएझैं थोरै लत्रीएको देखिन्थ्यो । ‘ त्यहिँ राखन म भरै फाल्छु ।‘ मैले भनें ।विकाशले यौटा प्लास्टिकको थैलामा प्रयोगमा आईसकेको कण्डोम राख्यो । मैले उस्लाई फेरी पलङ्गमा तानें र भनें ‘ विकाश मलाई त भकै छैन फेरी गरौं न । ‘ उ अलि असमञ्जसमा परे झैं देखियो । मैले उसमा उत्तेजना भर्ने हिसाबले एकहातले उसको लिँग खेलाउंदै जताततै उसलाई चुम्न थालें । उसको पनि संभोगको ईच्छा पुर्ती भै सकेको थिएन होला उ पनि मेरा दुबै स्तनका मुण्टोहरु पालै पालो चुस्न थाल्यो । हामीबिच एक प्रकारले चुस्ने प्रतिस्पर्धा भयो । यहि क्रममा विकाश मेरो योनि मै पुगेको थियो , मैले पहिले देखि नै नोटिस गरेकि थिएं विकाश मेरो योनि चुस्न निक्कै सिपालु छ अनि निक्कै मन गर्छ पनि । म पनि उसको लिँग चुस्न थालें । केहि बेरमा मैले आफ्नो मुखभित्र उसको लिँगमा कडापन आएको महसुस गर्दैथिएं । एक्कासी उसले आफ्नो मुख मेरो योनिबाट हटायो र मलाई पल्टाएर घोप्टो फर्कायो । उसले दुबै हातले मेरो कम्मरमा कस्सेर समात्दै मेरो कम्मर मुनिको भागलाई केहि उचालेर मेरो योनिमा पुन लिँग पसाउन थाल्यो । म स्वत उसलाई सजिलो हुने आसनमा बसें । मेरो छाती देखि माथी टाउको सम्म डसनामा जोतिएको थियो भने तलतिर तिघ्रा अलि फारिएको अवस्थामा घुँडा टेकेकि थिएं । फेरि नयाँ जोसको साथ विकाश मलाई धकेल्दै थियो । अहिले मलाई अझै धेरै पिँडा भै रहे पनि म त्यो सब सहन तयार थिएं । विकाशले यो पल्ट कन्डोम लगाएको थिएन । मैले उसलाई सोधें ‘ विकाश अर्को कण्डोम किन नलगाएको ? म आमा भएं भनें ? ‘ विकाश मलाई अझै जोडले धकेल्दै बोल्यो , ‘ भयौ भने म बाउ हुन्छु । ‘ मलाई संयमित हुन सिकाउने विकाश संभोगको दौरान आफैं बहकिएको थियो । प्रेममा मान्छे अन्धो हुन्छ भनेको यस्तै होला सायद । अहिले भने विकाशको लिँग फेदै सम्म मेरो योनिभित्र पसेको झैं लाग्दैथियो मलाई । म मेरो योनिको गालाहरुमा उसको दुई सुपारीका दानाहरु महसुस गर्दैथिएं । संभोगको चरम सुख भोग्दै थियौ हामी । यो पल्ट हामीदुबैको स्खलन हुने समय पनि एकै चोटी परेछ । गाईको बाच्छाले माउको थुन चुस्ता मुखको दुई कुनाबाट गजगजी फिँज काढे झैं बिकाशको लिँगले मेरो योनिमा घर्षण हुँदा मेरो योनिको कापहरुबाट पनि हामी दुबैको विर्यको फिँज गजगजी आएको थियो ।अन्तत हामी दुबैको जोस सेलाउंदै गएर मच्चिने क्रम रोकियो । हामीलाई एक अर्काको अँगालोबाट कहिल्यै नछुटिनु परे हुन्थ्यो जस्तै भै रहेको थियो । केहि बेर पछि म उठेर कपडा लगाएर तल झरें । आँगनको छेउमा ट्युब वेलको नजिक थियो हाम्रो बाथरूम , त्यहाँ पसेर छिट्छिटो नुहाएर म कोठामा आएं । विकाश आफ्नो कपडा लगाएर हाम्रो चर्तिकलाले खज्मजिएको पलङ्गको कपडा मिलाईओरी पलङ्गमै लडिरहेको थियो । म कोठामा पस्ने बित्तिकै मलै फेरी पलङ्गमै तानेर मेरो ओठ चुस्न थाल्यो विकाश । मैले पनि केहि बेर उसलाई साथ दिएं र चिया बनाउने बहानामा तल झरें । पछि पछि आउंदै गरेको विकाश बोल्यो , ‘ सानी अब कहिले हामी यसरी भेट हुने होला ? ‘ उसको अनुहारमा हामी बिछोडिनु पर्ने पिँडाका भावरेखाहरु थिए । उ पढ्नलाई पुने जाँदैथियो म काठमाण्डौ । हाम्रो भेट हुने संभावना नै थिएन । मैले अलि रिसाएको अभिनय गर्दै भनें ‘ काठमाण्डौ पढ्न जान्छु भनेर पुने तिर एडमिशन गर्नु पर्छ अनि भेट भै हाल्छ नि ।‘ याचना मिश्रीत स्वरमा विकाशले भन्यो ‘ म के गरौ त सानी , मैले त काठमाण्डौ नै पढ्छु भनेको नि , बाबाले मान्नु भएन । ‘‘पुने गएर मलाई नबिर्षिनु नि फेरि , फोनमा , च्याटमा अनि ईमेलमा कुरा गर्नु पर्छ । ‘ मैले सम्झाएं विकाशलाई । ‘ हुन्छ तर म त तिमी बिना पागल हुन्छु होला सानी । ‘‘ तिमी मात्रै पागल हुने हो र ? म पनि पागल हुन्छु होला नि , तर कुरा गरिरहनु पर्छ नि त्यस्तो हुँदैन ।‘ मैले सम्झाएं । उसले अब एकदुई दिन भित्र मौका मिलेन भने यो अन्तिम किस है भन्दै मलाई गहिरो चुम्बन गर्यो । मैले चिया पिएर जाउ भन्दै गर्दा नमानेर भारी मन सहित उ घर फर्कियो । म चिया बनाउन भान्सामा छिरें - मन त मेरो पनि भारी नै थियो ।जतिसुकै नछुट्टीने कोसिस गरेपनि समयको अगाडी हाम्रो के लाग्थ्यो र ? समयलाई बसमा राख्न कहाँ सक्थ्यौं र हामी ? म काठमाण्डौ जानुभन्दा हप्तादिन अगाडी नै विकाश पुनेतिर गयो । विकाशलाई बिदा गर्न म बस स्ट्याण्डसम्म जान पाउने संयोग परेको थियो उध्येश्य भने काठमाण्डौको लागी आफ्नो टिकट बुक गर्नु थियो । छुट्ने बेलातिर विकाशको रुञ्चे अनुहार देखेर मेरो मन पनि भक्कानिएर आएको थियो । हामी त्याहाँ एक अर्काको अंगालोमा कसिएर बिदाईको चुम्बन साटासाट गर्न सक्ने स्थितिमा थिएनौं । केवल सजल नेत्रले एकअर्कालाई हेरेरै हामी बिदा भयौं । त्यसबेला मलाई कुनै गीतको अँश याद आईरहेथ्यो - ‘ समयनै ईश्वर हो समयले हिंडाउंछ तिम्रो मेरो अलग बाटो दोबाटोले छुटाउंछ ….’ तर हाम्रो परिस्थितीमा अहिले दोबाटो आएको भएपनि मिलनको दृढ संकल्प त छँदैथियो गाउँमा चौबिसै घण्टा विकाश संगै टाँसिएर त बस्दिनथें म फेरीपनि गाउँमा विकाश छैन भन्ने थाहा भएपछि गाउंनै शुन्य लागेको थियो मलाई । मन त्यसै बिरक्तिएर आएको थियो । एक साता मुश्किलले काटेर म काठमाण्डौ आएं । कलेज शुरु भै सकेको थियो । काठमाण्डौ आउनासाथ यो पटक मलाई केहि बिसञ्चो भएको भएपनि दुईदिन जती आराम गरेर ठिक भएकि थिएं । तेस्रो दिन बिहानै म कलेज जानलाई बस कुरीरहेकि थिएं मेरो नजिकै कसैले बाईक रोक्यो र म तिरै संबोधित भएर बोल्यो , ‘ तपाईंलाई म कहिं छाडीदिन सक्छु ?’ ‘ नो थ्याङ्क्स । मेरो बस आउंछ । ‘ उ तिर खासै ध्यान नदिएर मैले भनें । उसले आफ्नो टाउकोबाट हेल्मेट उतार्दै भन्यो , ‘ तपाईँ यतै कतै बस्नुहुन्छ ? निक्कैदिन भयो मैले तपाईंलाई नदेखेको । भेट्छु भन्ने त लागेको थियो ; आज भेटें ।” हेल्मेट उतारे पछि त्यो मान्छेलाई मैले कहाँ भेटे जस्तो कहाँ देखे जस्तो लागेको थियो । म चुपचाप उसलाई सम्झने कोसिसमा थिएं । मेरो बस आयो र म बसमा चढें । कलेज पुगुञ्जेलसम्म मलाई त्यो मान्छेले सम्झनामा पछ्याईरहयो । कहाँ देखेकि थिएं त्यो मान्छेलाई भनेर मैले सम्झनै सकिनं । भेट्छु भन्ने त लागेको थियो ; आज भेटें उसको पछिल्लो बाक्यले मलाई उसको बारेमा सोच्न बाध्य बनायो । मैले त कहिल्यै उसलाई भेटे जस्तो लाग्दैन , उसले मलाई कहाँ देख्यो होला र भेट्छु भन्ने लागेको होला । दिनभरी मनमा यस्तै खुल्दुली भईरहयो ।अर्कोदिन पनि बिहानै बस पर्खिरहँदा उ बाईकमै देखापर्यो । आज उसको हेल्मेट बाईकमा पछाडी राखेको थियो । मैले उसलाई अझै सम्झन सकेकि थिईनं तर उ भने जन्मौं देखिको परिचित झैं परैबाट मुस्कुराउंदै मेरो छेउमा आयो र मेरो नाम सोध्यो ।‘ सानी । ‘ मैले आफ्नो नाम बताएं । उ किन यसरी मेरो पछि परिरहेको छ ? लव एट फर्स्ट साईट भनेझैं भएको हो कि उसलाई । उ आफुपनि ह्याण्डसम थियो । म पनि कहिं कतै उ प्रति आकर्षित भएकि थिएं कि ? हामीबिच कहिं केही त पक्कै पनि हुनु पर्थ्यो तर कहाँ के थियो मैले बुझ्नै सकिरहेकि थिईनं ।‘सानी त तिम्रो घरको बोलाउने नाम पो होला नि , हैन र ? जे होस राम्रो नाम छ । म रिनभ । तिमीलाई भेटेर खुशी लाग्यो । ‘ उसले म तिर हात बढायो । मैले पनि उ संग हात मिलाउंदै धन्यवाद मलाई पनि खुशी लग्यो भनें । मेरो बस आईसकेको थियो । म जान्छु ल भन्दै बसमा चढ्न अघि बढें । ‘ म पनि एभरेष्टमै पढ्छु । संगै जाने हो ? ‘ उ भन्दैथियो । म बसको ढोकामा पुगीसकेकि थिएं । भित्र छिर्दै म बोलें , ‘ हैन बस नै ठिक छ । थ्याङ्क्स दो । ‘बसभित्र हिंजैमात्र चिनेकी साथी अनिता थिई । म उसैको छेउमा बसें । ‘ रिनभलाई तिमीले कहिले देखि चिनेकी ? ‘ उसको नजिक बस्नासाथ उसले मलाई सोधि । ‘ अहिले भर्खरै । किन र ? ‘ जवाफ दिएर मैले पनि सोधें ।‘ त्यसै । ‘ उसले बताउन चाहिन । केहिबेर चुपलागेर फेरी उ बोली , ‘ यु आर लक्की सानी । आई फील जेलस टु यु । ‘ उसको बोली केहि मधुरो थियो । ‘ ह्वाई ? ह्वाई यु फील जेलस टु मी ?’ मलाई जान्ने उत्सुकता भयो । ‘आई विल टेल यु लेटर , नट नाउ । ‘ अनिताले भनी ।‘ आई नो अनि , ह्वाई यु फील फील जेलस टु हर । ‘ पछाडीबाट अर्को केटा बोल्यो । उसले अनितालाइ अनि मात्रै भन्दोरहेछ । उसले अनि भनेको मलाई राम्रो लाग्यो । ‘ उड यु प्लीज सट अप अवि ? ‘ अनिता बोली । अनिताले पनि उसलाई अवि भन्दा उनिहरु निक्कै घनिष्ट हुन भन्ने बुझिन्थ्यो अथवा उसको नाम अवि मात्र पनि होला ।‘ सानी , दिस बास्टर्ड ईज अविनास । अवि सि इज सानी । ‘ मैले उनिहरुको निकटताको बारेमा सोच्दै गर्दा अनिताले हाम्रो परिचय गराई । `वावो , ह्वाट अ नेम , सानी । ईज दिस योर न्वारानको नेम सानी ? ‘ अविनासले मलाई जिस्काउने शैलीमा भन्यो । बसमा भएका अरुपनि हाँसे । ‘ इज दियर एनि प्रोब्लम विद माई नेम ? ‘ म अविनास प्रति आक्रोशित भएर बोलें । ‘ इन्डिड माई नेम इज सुप्रिया अन माई आईडीज बट आई लाईक सानी मच बेटर ।‘‘ ओके सानी , आई विल कल यु सानी अलवेज ।‘ अविनास भन्दैथियो । वरिपरीका सबै हात हल्लाएर कोहि हाई सानी आई एम सुमित्रा , कोहि हाई सानी आई एम जेम्स , कोहि हाई सानी आई एम एन्जी…….. भन्दैथिए । मैले सबैलाई हात हल्लाएर हाई भनें । हाई हेल्लो भन्नलाई कलेजमा मेरा धेरै साथीहरु भैसकेका थिए तर घनिष्ठता भने अनिता संग थियो । एकदिन लाईब्रेरीमा दुईजना मात्र भएको बेला अनिताले सोधी , ‘ सानी उड यु माईण्ड ईफ आई से समथिङ्ग टु यु ? ‘ मैले भनें , ‘ अफ कोर्स यस । ईफ यु से समथिङ्ग ब्याड टु मी । ‘एकछिन हामी दुबै हाँस्यौं । अनिताले फेरी भनी , ‘ आई एम सिरियस सानी , मैले साँच्ची भनेकि । ‘ उ गंभिर देखिई । ‘ म पनि सिरियस छु सानी । क्यारी अन । ‘ गंभिर बन्ने प्रत्यत्नमा मैले भनें ।‘ यु नो आई……… आई लभ रिनभ एण्ड नाउ आई अफ्रेड द्याट हि ईज पेईङ एटेण्सन टुवार्ड यु । ‘ अनिता मैले भरोसा गर्ने यौटैमात्र साथी । उस्लाई रिनभले मलाई मन पराउंछ भन्ने चिन्ता रहेछ । मलाई कता कता रिस उठे पनि यो कुरालाई सामान्य रुपमा लिएं मैले । म यौटा असल साथी गुमाउन चाहन्नथें । रिनभसंग मेरो त्यस्तो केहि छैन भनेर मैले अनितालाई संझाएं । मैले विकाशको बारेमा पनि उसलाई भनें । सकेसम्म उसलाई विश्वास दिलाएर म ढुक्क थिएं तर त्यस रात अबेर सम्म मेरो मनमा कस्तो बेचैनी रहिरह्यो । भोलीपल्ट मेरो निन्द्रा खुल्दा अबेर भै सकेको थियो । कलेज छुट्ला भनेर हतार हतार गरेर बाहिर निस्कंदा बस छुटिसकेको थियो तर म संधै बस चढ्ने ठाउँमा रिनभ मलाई नै कुरेझैं बसिरहेको थियो । मलाई देख्नासाथ उ बोल्यो , ‘ ढिलो भयो ? आउ संगै जाउं । ‘ म संग बिकल्प थियो पनि होला , जसोतसो म ट्याक्सी गरेर कलेज जान त सक्थें तर त्यसको लागी लाग्ने खर्च जोगाउन सके मलाई क्याण्टीनमा खर्च गर्न हुन्थ्यो त्यसैले म चुपचाप उसको बाईकमा पछाडी बसें । केहिबेर नबोलेरै हामी अगाडी बढिरहयौं । केहि अगाडी पुगेर यौटा पसलको अगाडी बाईक रोक्दै उसले भन्यो , ‘ सानी म सिगरेट लिईहालुं है ।‘ मलाई आपत्ती थिएन म बाईकबाट ओर्लिएर छेउमा उभिएं । उ चुपचाप पसलमा गयो र एक प्याकेट सिगरेट लिएर फर्क्यो । बाईक स्टार्ट गर्दै बोल्यो उ , ‘ सानी तिमीलाई थाहा छ यो पसल ? ‘‘थाहा छैन त ।‘ केहि नसोचिकनै उसको पछाडी बस्दै म बोलें ।‘मैले तिमीलाई यहि पसलमा पहिलो चोटी भेटेको । ‘‘ हो र ? कहिले ? ‘ हाँस्दै बोलें म ‘ मलाई थाहा छैन । ‘‘ भुल्यौ होला तिमीले तर म त्यो भेट कहिले भुल्न सक्दिनं । तिमी त्यसदिन कण्डोम किन्दैथियौ । ,‘ओ माई गड ! ‘ मनमनै बर्बराएं म । ‘ मैले कण्डोम किन्दा पसल बाहिर बसेर चुरोट तान्ने केटा ?’‘ साँच्ची कस्को लागी किनेको तिमीले ? ‘ मेरो मौनता भंग गर्दै रिनभले सोध्यो ।‘ आफ्नै लागी । तर तिमीलाई किन चासो नि मेरो ब्याक्तीगत कुरामा ? ‘ आपत्ती जनाएं मैले ।‘ हैन त्यस्तो केहि हैन । सोधेको नि । ‘ एकछिन चुप लाग्यो उ ।‘ त्यही भएर तिमी मेरो पछि लागेको ? तिमीलाई म त्यस्तो खालको केटी लाग्यो ? ‘ मैले अली कडा बन्ने हिसाबमा भनें ।‘ हैन यार तिमी मलाई गलत बुझ्दैछौ । मलाई त त्यही दिन तिम्रो तर्कशक्ती देखेर पो तिमी मन परेको । म तिमीलाई मन पराउंछु सानी तर मलाई गलत नबुझ । तिमीले मलाई मन पराउंदैनौ भने पनि ठिकै छ । मैले मन पराएको मान्छेले मलाई पनि मन पराउनु पर्छ भन्ने पनि छैन । ‘ रिनभले एकै सासमा उसको मन राख्यो । कति सजिलो कसैको अगाडी मन राख्न ? सहरबजारका केटाहरुलाई केटी मन पराउनु भनेको कुनै सिनेमा मनपराउनु जस्तो हो कि क्या हो ? हामी कलेज पुगीसकेका थियौं । कलेजभित्र म रिनभसंग छिर्दा धेरैले देखे । उनिहरुले सायद गलत अर्थ लगाए होलान । मलाई अनितालाई यो सबै कुरा सुनाउन मन थियो तर उ हामीलाई देखेर पनि नदेखे जस्तै गरेर अर्कोतिर गई । उ रिसाई होला जस्तो लाग्यो र मैले बोलाएं पनि तर उ सुनेको नसुने झैं गई । क्लासरुमभित्र संगै बस्ने अनिता मसंग नबसेर पछाडी गएर बसी । ब्रेक हुनासाथै मैले उसलाई बोलाएं तर उसले सबैको अगाडी मेरो बेईजत गर्दै भनि , ‘ यु फ्रिकिन विच । हाउ डेयर यु टेक राईड विद रिनभ ? आई अलरेडी टोल्ड यु रिनभ ईज माई ब्वाई फ्रेण्ड । आ‘म सरी विच , यु आर नो मोर माई फ्रेण्ड ………….. ‘ अनिताले मेरो कुरै सुनिन । एकोहोरो मलाई गाली गरिरही । निक्कै सिपालु रहिछे उ झगडा गर्न । मैले केहि भन्नै सकिनं न त मन थाम्नै सकें । म क्लासरुममा सबैको अगाडी रोएं ।म रोएको देखेर केहि हाँस्नेहरु थिए । केहि मलाई सम्झाउंदै थिए । सम्झाउनेमा अविनाश पनि थियो । मसंग अरुभन्दा अलिबढि घुलमिल भएको नाताले त्यसबेला मेरो सहारा बन्यो अविनाश । ‘ म घर जान्छु । आज क्लास लिन सक्दिनं । ‘ मैले ट्याक्सी बोलाउन अविनाशको सहयोग मागें । मेरो क्लासमा बस्न सक्ने स्थिती पनि थिएन । अविनाश मलाई बाहिर सम्म छोड्न आयो । दुईतिन दिन सम्म म कलेज जान सकिनं । जानै मन लागेन । मैले कलेज फेर्ने निर्णय गरेकि थिएं । एकदिन अविनाश र सुमित्रा मेरो घर आए र मलाई कलेज जान कर गर्न थाले । मैले उनिहरुलाई कलेज फेर्ने कुरा सुनाएं । उनिहरु दुबैजनाले मलाई गाली गर्दै सम्झाए । मैले अनिताको अगाडी हारेर हैन जितेर देखाउनु पर्छ भन्ने उनिहरुको मान्यता थियो । एक हिसाबले मलाई उनिहरुको कुरा ठिक पनि लाग्यो । रिनभले अनितालाई मनपराउंदैन र अनिताले म संग झगडा गरेको कुरालाई लिएर रिनभले अनितालाई गाली गर्यो भनेर पनि उनिहरुले मलाई सुनाए । मैले भोली देखि कलेज जाने बिचार गरें । भोलीपल्ट बिहान पनि अविनाश र सुमित्रा मलाई लिन आए । अविनाशले पनि नयाँ बाईक किनेको रहेछ , म उनिहरु संगै बहिर निस्कंदा थाहा भयो । ‘ आजदेखि हामी संधै बाईकमा कलेज जाने ।‘ अविनाशले भन्यो ।‘ तर तिम्रो बाईकमा तिनतिन जना कसरी जाने नि ? ‘ मैले जिज्ञासा राखें ।‘ ए , तिमी कहाँ मेरो अविनाशको बाईकमा जान पाउंछौ त ? तिम्रो बाईक उ त्यहाँ छ । ‘ सुमित्राले भनी ।सुमित्राले देखाएतिर रिनभ मुसुमुसु हाँस्दै थियो । उ बाहिर नै मलाई पर्खिरहेको रहेछ , बोल्यो , ‘ जान्छौ हैन मेरो बाईकमा ? ‘म रिनभको बाईकमा बसें । अविनाश र सुमित्रा अविनाशको बाईकमा थिए । अविनाशले अनितालाई मनपराउंथ्यो अनिताले रिनभलाई तर सुमित्राले अविनाशलाई मन पराउदिरहिछे यो मलाई थाहा थिएन र अहिले सुमित्रा र अविनाश जोडी बनिसकेछन । ‘ ब्यावहारले मान्छेलाई मान्छे देखि टाढा पुर्याउंछ । ‘ यो उखान चरितार्थ भएको थियो अनिताको जीवनमा । आजभोली उसको मिल्ने साथी थिएन । म संग बोल्न खोजुंला जस्तो गर्छे कहिलेकाहिं तर म उसलाई वास्ता गर्दिनं । हरेकदिन कलेज जाँदा रिनभ र अविनाश पर्खि पर्खि कलेजको बससंगै बाईक हिंडाउथे । अनितालाई देखाएर जलाउने उनिहरुको चाहना , मेरो पनि त्यही थियो कामना । म अनितालाई जलाउनकै लागी रिनभको पछाडी चपक्कै टाँसीएर बाईकमा बस्थें । रिनभसंग प्रेमको नाटक गर्दागर्दै मलाई रिनभ साँच्चै मनपर्न थाल्यो । सधैं रिनभलाई देखिरहन मन हुन्थ्यो ।आखिर प्रेम भन्नु पनि एक प्रकारले नशा न हो । मलाई रिनभसंग हिंड्ने डुल्ने नशा लागीसकेको थियो त्यही क्रममा सायद मलाई रिनभसंग शारिरिक संबन्ध राख्ने पनि उत्कट ईच्छा भएर आएको थियो । तर कहाँ कसरी म उसलाई यो कुराको प्रस्ताव राख्ने , अलमलमा थिएं । रिनभलाई पनि त्यस्तै भएको हुनुपर्छ तर उसले पनि मलाई प्रस्ताव राख्न सकेको थिएन । एकदिन कलेजबाट फर्किंदै गर्दा रिनभलाई त्यही पसल अगाडी बाईक रोक्न लगाएं र भनें , ‘ रिनभ आज तिमी मेरो घरमा बस्ने ल ? म एक्लै छु घरमा । ‘रिनभ अलमल्ल पर्यो । उ प्रतिक्रियाविहिन देखेर फेरी मैले सोधें , ‘ हुन्छ कि हुन्न ? ‘‘ हुन्छ । भै हाल्छ नि तर तिम्रो आण्टीहरु ? ‘ ‘ वहाँहरु गाउँ जानु भएको छ । अंकलको घरमा कुन्नि कसको बिहे छ रे ।‘ मैले भने , ‘ तिमी केहि कण्डोम किनेर ल्याउंछौ ? ‘ यति भनेपछि मैले रिनभलाई म तिमिसंग सुत्न चाहन्छु अथवा तिमीसंग शारिरिक सम्बन्ध राख्न मन लागेको छ भनिरहनु परेन ।‘ हँ ! ‘ केहि झस्किएर रिनभ बोल्यो , ‘ हुन्छ म गएर आउंछु । ‘रिनभले त्यही पसलबाट केहि कण्डोम लिएर आयो । हामीलाई घरजानु हतार थिएन त्यसैले हामी घुम्न जाने मूडमा थियौं । ‘ भोली कलेज बिदा पनि छ बरु हामी कतै बाहिर जाउं न । ‘ रिनभले उपाय सुझायो , ‘ नगरकोट जाने हो ? ‘मलाई केहि आपत्ती थिएन । घर पुगेर एकरात बस्ने तयारीका साथ हामी बाटो लाग्यौं । बाटैभरी म रिनभसंगको यौनानन्दको कल्पनामा मस्त बनिरहें । त्यसै त ढिलो हिंडेका थियौ हामी त्यसमाथी बाटोमा पर्ने अरु ठाउं पनि घुम्दै आएका थियौ । त्यसैले हामी सांझमा मात्रै गन्तब्यमा आईपुग्यौं र यौटा लजमा बस्यौं ।रात जब म रिनभसंग यौटै बेडमा नग्न अवस्थामा थिएं मलाई विकाश याद आयो । उ के गर्दै होला ? मलाई उसको माया लागेर आयो । विचरा विकाश मलाई सम्झेर सुतेको होला यसबेला । म भने यो के गर्न जाँदैछु ? म विकाशलाई सम्झेर पुरानो यादमा हराईरहेको बेला रिनभ मेरो खुट्टाबाट मलाई चुम्न शुरुगर्दै माथि बढ्दै थियो । जब रिनभको मुख मेरो पेण्टीमाथीबाट मेरो योनिमा आईपुग्यो मैले विकाशलाई सम्झिरहन सकिंन । म उत्तेजनाको चरम उत्कर्समा थिएं । मेरा हातहरु आफ्नै स्तन निचोर्न ब्यस्त थिए । रिनभले उसको दाँतले टोकेर मेरो पेण्टी उतार्ने कोसिस गर्दैथियो मैले ढाड र कुर्कुच्चाको बलले आफ्नो योनिभाग उठाईदिएं । मेरो पेण्टी उतारेर रिनभ मेरो योनि चुस्न थाल्यो । आनन्दको यो क्षणले मलाई स्वर्गको अनुभुती दिलाईरहेथ्यो । मैले रिनभलाई तानेर बेडमा लडाएं र उ माथी चढेर उसको नाडीझैं कडा लिंग आफ्नो मुखमा लिएर चुस्न थालें । हामी एक अर्काको ठिक बिपरित थियौं । रिनभ मेरो योनि चुस्दैथियो म उसको लिंग । केहिबेर सम्म यो प्रक्रिया चलेपछि रिनभले मलाई कम्मरमा समाएर उचाल्दै बेडमा उत्तानो पारेर सुतायो र मेरो कानमा आएर फुस्फुसायो , ‘ सानी , तिमी तयार हो ? ‘ मैले उसको ओठमा एक चुम्बन दिएर मुस्कुराउंदै हो भन्ने संकेत दिएं । रिनभ म माथी चढ्न आयो । उसको शरिरको वजन मेरो शरिरमाथी पर्दा मलाई मसाज गराएझैं हुंदैथियो । मैले आफ्नो दुबै आखा चिम्लिएकी थिएं । मेरो हात रिनभको चौडा ढाड सुम्सुम्याउंदै थिए । रिनभले पनि उसको दुबै हातले मलाई कसिरहेको थियो । यो अवस्थामा उसको लिंग मेरो योनिमा सहजै पस्न सक्ने थिएन त्यसैले मैले मेरो एक हात उसको ढाडबाट हटाएर उसको लिंगमा लगें र उसको मोटो लामो लिंगलाई समाएर मेरो योनिको प्रवेशद्वारमा राखें । रिनभ मलाई भन्दैथियो , ‘ आखा त खोल । किन लाज मानेकि सानी ? ‘ मलाई कतिबेला रिनभको लिंग मेरो योनि भित्र प्रविष्ट हुन्छ र मेरो यौनाग्नी शान्त पार्छ भन्ने हतार भैरहेको थियो । मैले आखा खोलेर पुन रिनभको ओठमा आफ्नो ओठ जोड्दै भने , ‘ छिटो न । ‘ रिनभले हलुकासंग उसको लिंग मेरो योनीभित्र प्रवेश गराउन थाल्यो । उसले म माथी मच्चिएकै तालमा ताल मिलाएर म पनि तलबाट माथीतिर आफ्नो योनि भाग उठाउंदै उसलाई साथ दिन थालें ।यो अबर्णनिय आनन्दमा डुब्ने क्रममा हामीले ल्याएको कण्डोम पनि प्रयोग गर्न भुलेका रहेछौं । त्यसो त मलाई आफ्नो योनिभित्र कण्डोम रहित लिँगकै घर्षण मन पर्छ । सारा संसार बिर्षेर हामी त्यसरात झिमिक्कै नसुती पटक पटक यौनानन्दमा लीन भै रहयौं……

मेरो सुहागरात

मैले करिब् १५ बर्षको उमेर बाट छोल्न सुरु गरेको हुँ । केटीको नांगो फोटो हेर्दै छोल्दै गर्थे । पछी राती राती घरमा लुकेर ब्लु फिल्म हेर्दै दिन थाले । म धेरै नबोल्ने खाल्को भएको ले चिक्न को लागि केटी पाउन असम्भव भएकोले हात ले नै काम चलाऊदै अाइ रहेको थिए । सत्ताइस बर्षमा मेरो बिहे हुँदा म भर्जिन भये पनि ब्लु फिल्म हेरेर कसरी चिक्नु पर्छ भन्ने बारेमा प्रसस्त ज्ञान हासिल गरिसकेको थिए । असाध्ये सेक्सी राम्री केटी पाएर मक्ख परे पनि अली अली नर्वस थिए । मेरो स्वास्नि त चिक्ने मामिला मा त म भन्दा पनि झनै अनादी रैचे । उस्ले त चिक्ने भनेको लाडो पुती म हालेर नचलाई कन राखे पछी केही छिन् पछी आँफै फुसी झर्छ भन्ने सोचे कि रैचे । बिहे को पहिलो रात गफ गरियो अरु केही गरिएन । किस सम्म नगरि पहिलो रात बिताइयो । पहिलो रात मेरो लाडो ठन्केर साह्रै दु:ख दिये पनि सहेर रात काटे । केही बर्ष बच्चा नपाउने सल्लाह भएको ले भोली पल्ट जिन्दगी मा पहिलो पल्ट नजिकै को मेडिकल मा कन्डम किने । आज राती चाँही नचिकी नछोड्ने भये । बेड मा सुते पछी बुडिको दुध माड्न थाले । उ इमोसन मा अाइ । पेन्टी सहित् सबै लुगा खोली उस्को टिसी र पुती हात ले खेलाई दिए। उस्को पुती बाट पानी झर्न थाल्यो। मेरो लाडो ठन्केर काठ जस्तो सारो भएको थियो। मैले लाडो मा कन्डम फिट गरेर उस्लाई उत्तानो पारेर पुती मा लाडो छिराउन खोजेको त दुख्यो भन्न थालि। तै पनि सहेर मेरो लाडो को धक्का सहन थालि। सुरु मा आधा लाडो मात्र छिराएर बिस्तारै भित्र बाहिर गर्न थाले । उस्लाई दुखाइ पनि मजा पनि हुन थालेछ । एकै छिन्मा झरी हाल्यो। त्यो पहिलो रात २ पटक चिकियो। मेरो लाडो को टुप्पो को छाला पहिलो पटक फर्केको ले हल्का पिडा भये पनि समग्र मा सुहाग रात को मज्जा लिए।